,

मेट्रो स्टेशन या राजनीतिक नामपट्ट?

आगरा मेट्रो के स्टेशनों के नाम तय करने से पहले जरूरी है एक सवाल, क्या सार्वजनिक परिवहन के नाम राजनीतिक दबाव से तय होंगे या यात्रियों की सुविधा और शहर की पहचान से?

आगरा में मेट्रो अभी पूरी तरह आकार भी नहीं ले पाई है, लेकिन उसके स्टेशनों के नामों को लेकर राजनीति ने रफ्तार जरूर पकड़ ली है। सरोजिनी नायडू मेडिकल कॉलेज के छात्र वहां बन रहे स्टेशन का नाम केवल ‘मेडिकल कॉलेज मेट्रो स्टेशन’ रखे जाने पर सवाल उठा रहे हैं। व्यापारी वर्ग एम.जी. रोड पर प्रस्तावित एक स्टेशन का नाम ‘व्यापार शक्ति’ रखने की मांग कर रहा है। फतेहाबाद रोड पर एक स्टेशन का नाम शहीद कैप्टेन शुभम गुप्ता के नाम पर रखा जा चुका है। बिजलीघर स्टेशन पहले ‘जामा मस्जिद’ और फिर ‘मनकामेश्वर’ हो चुका है। आगरा किला मेट्रो स्टेशन का नाम डॉ. भीमराव आंबेडकर चौक किए जाने का प्रस्ताव भी सामने आया है।

और यह सिलसिला अभी शुरू ही हुआ है।

इन सभी मांगों और फैसलों को एक ही तराजू पर तौलना उचित नहीं होगा। खासकर शहीद कैप्टेन शुभम गुप्ता के नामकरण को बाकी मांगों के साथ जोड़कर देखना उनके बलिदान के साथ अन्याय होगा। उनका घर उस क्षेत्र के निकट है और वह स्थान उनकी स्मृति से भौगोलिक रूप से भी जुड़ा हुआ है। आगरा का एक बड़ा वर्ग अपने इस बलिदानी सपूत पर स्वाभाविक रूप से गर्व करता है। यदि उनके नाम पर मेट्रो स्टेशन का नामकरण होता है तो इसे केवल किसी संगठन या राजनीतिक समूह की मांग नहीं, बल्कि शहर की सामूहिक भावना का सम्मान माना जा सकता है।

लेकिन यहीं से एक अधिक महत्वपूर्ण सवाल शुरू होता है।

क्या हर मेट्रो स्टेशन का नाम किसी न किसी समूह की मांग, राजनीतिक दबाव या पहचान की राजनीति के आधार पर तय किया जाएगा?

अगर जवाब हां है, तो समस्या केवल नामों की नहीं होगी। समस्या उस व्यवस्था की होगी जिसमें सार्वजनिक परिवहन के नामकरण के लिए कोई स्पष्ट, पारदर्शी और स्थायी नीति ही नहीं है और जिसके अभाव में हर प्रभावशाली समूह अपने आग्रह को सार्वजनिक नामकरण का आधार बनाने की कोशिश कर सकता है।

मेट्रो स्टेशन कोई स्मारक पट्टिका नहीं है। वह शहर के सार्वजनिक परिवहन तंत्र का महत्वपूर्ण नेविगेशन पॉइंट है। उसका नाम सुनते ही यात्री को मोटे तौर पर यह समझ आना चाहिए कि वह शहर के किस हिस्से में पहुंचने वाला है।

आगरा जैसे पर्यटन शहर में यह बात और महत्वपूर्ण हो जाती है। यहां रोज देश और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से लोग आते हैं। उनमें से बहुत से यात्रियों को स्थानीय राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक संदर्भों की जानकारी नहीं होती। उनके लिए स्टेशन का नाम सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि दिशा-सूचक होता है।

इसलिए स्टेशन का नाम केवल इस आधार पर तय नहीं किया जाना चाहिए कि कौन-सा समूह किस नाम की मांग कर रहा है।

नाम और जगह का रिश्ता टूटना नहीं चाहिए

‘ताजमहल पूर्वी गेट’ इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। यदि किसी स्टेशन से ताजमहल का पूर्वी गेट वास्तविक रूप से काफी दूर है और शिल्पग्राम उससे अधिक निकट है, तो नाम और भौगोलिक स्थिति के बीच का यह अंतर भविष्य में यात्रियों के लिए भ्रम पैदा कर सकता है।

जिस पर्यटक ने ‘ताजमहल पूर्वी गेट’ सुनकर वहां उतरने का फैसला किया, वह स्वाभाविक रूप से यही मानेगा कि वह ताजमहल के उस प्रवेश द्वार के पास पहुंच गया है।

यात्री सुविधा के लिहाज से स्टेशन का नाम उस स्थान की वास्तविक पहचान से जितना अधिक जुड़ा होगा, उतना ही बेहतर होगा।

बिजलीघर स्टेशन का मामला भी इसी संदर्भ में सवाल खड़ा करता है। स्टेशन बिजलीघर क्षेत्र में है, लेकिन उसका नाम पहले ‘जामा मस्जिद’ और फिर ‘मनकामेश्वर’ किया गया। यदि स्टेशन किसी स्थानीय क्षेत्र के नाम से पहचाना जाता रहा हो और बाद में उससे काफी दूरी पर स्थित किसी धार्मिक स्थल का नाम दे दिया जाए, तो यह विचार करना जरूरी है कि इससे यात्री की सुविधा वास्तव में कितनी बढ़ती है।

किसी धार्मिक स्थल, महापुरुष, शहीद या ऐतिहासिक व्यक्तित्व के नाम पर सार्वजनिक स्थल का नामकरण अपने आप में गलत नहीं है। बल्कि कई बार यह शहर की स्मृति और सम्मान को स्थायी रूप देने का महत्वपूर्ण माध्यम होता है।

लेकिन हर नामकरण का अपना संदर्भ और औचित्य होना चाहिए।

सम्मान और दबाव की राजनीति में फर्क है

शहीद कैप्टेन शुभम गुप्ता का उदाहरण इसलिए अलग है क्योंकि यहां नाम और व्यक्ति के बीच भौगोलिक तथा भावनात्मक संबंध मौजूद है। उनके बलिदान से आगरा की सामूहिक स्मृति जुड़ी हुई है।

लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि हर मेट्रो स्टेशन का नाम किसी सामाजिक, धार्मिक, जातीय या कारोबारी समूह की मांग के आधार पर बदल दिया जाए।

यही अंतर समझना जरूरी है।

आज यदि व्यापारी संगठन ‘व्यापार शक्ति’ नाम की मांग करता है, तो कल कोई दूसरा संगठन अपने सामाजिक या जातीय नायक के नाम की मांग करेगा। कोई धार्मिक संस्था अपने आराध्य या धार्मिक स्थल का नाम चाह सकती है। कोई राजनीतिक संगठन किसी दूसरे व्यक्तित्व का नाम आगे कर सकता है।

यदि हर मांग को उसके राजनीतिक प्रभाव और दबाव के आधार पर स्वीकार किया गया तो धीरे-धीरे स्टेशन के नाम शहर की भौगोलिक पहचान के बजाय राजनीतिक प्रभाव का पैमाना बन जाएंगे।

यह किसी भी आधुनिक शहर के लिए स्वस्थ स्थिति नहीं है।

सरकार को अब नामकरण नीति बनानी चाहिए

यही वह समय है जब उत्तर प्रदेश सरकार और उत्तर प्रदेश मेट्रो रेल कॉरपोरेशन को एक स्पष्ट और पारदर्शी मेट्रो स्टेशन नामकरण नीति बनानी चाहिए।

यह नीति केवल आगरा के लिए नहीं, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश की मेट्रो परियोजनाओं के लिए लागू होनी चाहिए।

पहली कसौटी होनी चाहिए, भौगोलिक पहचान और यात्री सुविधा।

स्टेशन का प्राथमिक नाम उस सड़क, चौराहे, बाजार, रेलवे स्टेशन, बस अड्डे, प्रमुख सार्वजनिक संस्थान या ऐतिहासिक स्थल पर आधारित होना चाहिए जो स्टेशन के वास्तविक निकट हो और आम जनता के लिए स्पष्ट पहचान रखता हो।

दूसरी कसौटी होनी चाहिए, ऐतिहासिक या राष्ट्रीय महत्व।

यदि किसी शहीद, स्वतंत्रता सेनानी, महान सामाजिक सुधारक या अन्य महत्वपूर्ण व्यक्तित्व के नाम पर स्टेशन का नाम रखा जाना है, तो उसके लिए स्पष्ट मानदंड होने चाहिए। उस व्यक्ति का उस क्षेत्र से वास्तविक संबंध, उनके योगदान का महत्व और स्थानीय अथवा व्यापक जनभावना जैसे पहलुओं का निर्धारित प्रक्रिया के तहत मूल्यांकन होना चाहिए।

तीसरी कसौटी होनी चाहिए, स्थायित्व।

मेट्रो स्टेशन के नाम राजनीतिक परिस्थितियों के साथ बदलते नहीं रहने चाहिए। एक बार तय किया गया नाम बदलना असाधारण परिस्थिति हो, सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया नहीं।

और चौथी तथा सबसे महत्वपूर्ण कसौटी होनी चाहिए, दबाव की राजनीति को नामकरण का आधार न बनाया जाए।

लोकतंत्र में किसी संगठन, समुदाय, व्यापारिक वर्ग या नागरिक समूह को अपनी मांग रखने का पूरा अधिकार है। लेकिन सार्वजनिक संपत्ति का नाम इस आधार पर तय नहीं किया जा सकता कि किसकी राजनीतिक आवाज सबसे ऊंची है या कौन शासन पर ज्यादा प्रभाव डाल सकता है।

आज का फैसला, आने वाली पीढ़ियों का नक्शा

आगरा की मेट्रो आने वाले दशकों तक शहर के लाखों लोगों और करोड़ों पर्यटकों की यात्रा का हिस्सा बनने वाली है। आज जो नाम तय होंगे, वे केवल वर्तमान सरकार या वर्तमान पीढ़ी के लिए नहीं होंगे। वे शहर के स्थायी नक्शे का हिस्सा बन जाएंगे।

आज नाम बदलना आसान लग सकता है। लेकिन कल नाम बदलने का अर्थ केवल स्टेशन का बोर्ड बदलना नहीं होगा। टिकटिंग सिस्टम, डिजिटल मैप, मेट्रो घोषणाएं, सरकारी रिकॉर्ड, पर्यटन सामग्री, वेबसाइटें और यात्रियों की आदतें, सब पर इसका असर पड़ेगा।

अर्थात राजनीतिक नामकरण का प्रशासनिक और आर्थिक खर्च भी जनता को ही उठाना पड़ेगा।

इसलिए नाम तय करने से पहले यह तय होना चाहिए कि नाम किस सिद्धांत पर तय होंगे।

आगरा को अपने शहीदों पर गर्व है। उसे अपने महापुरुषों पर गर्व है। उसे अपने इतिहास, धर्म, संस्कृति और व्यापारिक विरासत पर भी गर्व है। इन सभी को सम्मान देने के लिए शहर में पर्याप्त सार्वजनिक स्थान हैं।

लेकिन मेट्रो स्टेशन का नामकरण उस सम्मान को यात्रियों की सुविधा और शहर की भौगोलिक पहचान के साथ संतुलित करके किया जाना चाहिए।

किसी एक नाम का सम्मान पूरे शहर की भावना हो सकता है, लेकिन हर नाम के लिए राजनीतिक दबाव बनाना सार्वजनिक व्यवस्था का सिद्धांत नहीं हो सकता।

आगरा मेट्रो को नामों की राजनीति से बचाने का रास्ता किसी खास नाम का विरोध करना नहीं है।

रास्ता है, एक ऐसी निष्पक्ष, पारदर्शी और स्थायी नामकरण नीति बनाना, जिसमें किसी सरकार, संगठन या राजनीतिक दल की तत्काल पसंद से ज्यादा महत्व शहर की दीर्घकालिक जरूरतों को मिले।

आखिर मेट्रो स्टेशन यात्रियों को यह बताने के लिए बनाए जाते हैं कि उन्हें कहां उतरना है, यह बताने के लिए नहीं कि शहर की उस समय की राजनीतिक ताकत किसके पक्ष में है।