जिस पिता ने बेटे को अपनी कार तक छूने नहीं दी, उसी के साथ उमरा की याद आज लकी अली के जीवन की सबसे गहरी स्मृतियों में है; महमूद की मौत के 22 साल बाद इहराम की बात ने फिर पितापुत्र के उस रिश्ते को सामने ला दिया है।

पिता के पास 27 गाड़ियां थीं, लेकिन बेटे को उनमें से एक भी चलाने की इजाजत नहीं थी। घर में एक कॉर्वेट भी खड़ी रहती थी और बेटा उसे चलाना चाहता था। पिता का जवाब साफ था, जब अपनी कमाई हो जाए, तब अपनी कार खरीदना और चलाना। बेटे को रोज सुबह पांच रुपये मिलते थे और शाम को उन पांच रुपयों का हिसाब देना पड़ता था। आने-जाने के लिए बस का इस्तेमाल करना पड़ता था। यह कहानी किसी साधारण परिवार की नहीं, बल्कि हिंदी सिनेमा के महान कॉमेडियन महमूद के घर की है। बेटा था, मकसूद महमूद अली, जिसे दुनिया लकी अली के नाम से जानती है। लकी अली ने 2025 में दिए एक इंटरव्यू में खुद अपने पिता की इस सख्ती को याद किया था।

आज लकी अली अगले महीने 68 वर्ष के हो जाएंगे। और अगस्त 2026 में एक लाइव कॉन्सर्ट के दौरान उन्होंने अपने प्रशंसकों के सामने ऐसी बात कही, जिसने उनके पुराने गीतों से जुड़ी पूरी एक पीढ़ी को भावुक कर दिया। गाते-गाते उन्होंने मौत की बात की और बताया कि वह जब भी सफर करते हैं, अपने साथ इहराम रखते हैं—वही कपड़ा जिसे वह अपना कफन मानते हैं। उनका कहना था कि मौत जहां आए, उन्हें वहीं दफना दिया जाए। इस बातचीत की रिपोर्ट 10 अगस्त 2026 को सामने आई।

लकी की यह बात सुनकर लोग भावुक हुए। किसी ने उन्हें ऐसी बातें न करने को कहा, तो किसी ने याद किया कि तीन दशक से उनकी आवाज उनके जीवन का हिस्सा है। लेकिन इस घटना की एक और तारीख है, जिसे नजरअंदाज करना मुश्किल है। 23 जुलाई को महमूद की पुण्यतिथि थी। 2004 में अमेरिका के पेन्सिलवेनिया में उनका निधन हुआ था। कुछ ही सप्ताह बाद लकी अली का इहराम और कफन को लेकर यह बयान सामने आया। इसलिए इस बात को केवल मृत्यु के बारे में एक भावुक टिप्पणी समझना शायद अधूरा होगा।

इहराम केवल दो सफेद कपड़े नहीं हैं। हज या उमराह के दौरान पुरुष इन्हें पहनते हैं और इनके माध्यम से सामाजिक हैसियत, धन और बाहरी पहचान से एक तरह की दूरी दिखाई जाती है। यही सफेद वस्त्र इंसान को उसकी अंतिम यात्रा की याद भी दिलाते हैं। लकी अली के लिए इस कपड़े का अर्थ शायद और निजी है।

उन्होंने बताया है कि उनके पिता के साथ उनकी सबसे अच्छी यादों में वह दौर शामिल है जब संगीत में उनका करियर स्थापित हो चुका था। वह पिता के साथ विदेश गए और दोनों ने साथ उमरा किया। लकी ने उस अनुभव को अपने पिता के साथ बिताए बेहद खास समय के रूप में याद किया था।

इसलिए आज जब वही लकी अली कहते हैं कि वह सफर में अपना इहराम साथ रखते हैं, तो इसे केवल मृत्यु की तैयारी के रूप में देखना शायद उस स्मृति को छोटा कर देना है। जिस सफेद कपड़े में उन्होंने अपने पिता के साथ धार्मिक यात्रा की थी, वही अब उनकी अपनी अंतिम यात्रा की तैयारी का प्रतीक बन गया है।

शायद यही इस कहानी का सबसे मार्मिक हिस्सा है।


लकी अली की कहानी को समझने के लिए महमूद से भी एक पीढ़ी पीछे जाना होगा।

उनके दादा मुमताज अली अपने समय के प्रसिद्ध नर्तक और अभिनेता थे। उनकी अपनी मंडली थी और वह देशभर में कार्यक्रम करते थे। लेकिन जिंदगी हमेशा एक जैसी नहीं रहती। शराब की लत और आर्थिक संकट ने परिवार को बुरी तरह प्रभावित किया। उनके कई बच्चों वाले परिवार में हालात इतने खराब हुए कि छोटी उम्र में ही बच्चों को काम करना पड़ा।

इन्हीं बच्चों में एक थे, महमूद।

महमूद ने जिंदगी की शुरुआत फिल्मी चमक के साथ नहीं, बल्कि संघर्ष से की। उन्होंने अंडे और मुर्गियां बेचीं, टैक्सी चलाई और फिल्मकार पी.एल. संतोषी की गाड़ी भी चलाई। बाद में वही आदमी हिंदी सिनेमा के सबसे लोकप्रिय हास्य कलाकारों में शामिल हुआ।

महमूद ने 300 से अधिक फिल्मों में काम किया। वह सिर्फ अभिनेता नहीं थे। उन्होंने आर.डी. बर्मन जैसे संगीतकारों को अवसर दिया और संघर्ष कर रहे अमिताभ बच्चन को भी अपने घर में जगह दी। ‘बॉम्बे टू गोवा’ में अमिताभ को मुख्य भूमिका देने का प्रसंग उनके रिश्ते की सबसे चर्चित कड़ियों में से एक है।

लेकिन इस रिश्ते की कहानी उतनी सरल नहीं थी जितनी अक्सर फिल्मी किस्सों में दिखाई जाती है। महमूद ने अमिताभ बच्चन को संघर्ष के दौर में अपने करीब रखा था। बाद में अमिताभ बड़े स्टार बने। महमूद उन्हें बेटे जैसा मानते थे। लेकिन वर्षों बाद इस रिश्ते में एक ऐसी चोट आई, जिसका उल्लेख खुद महमूद ने किया।

अपने संस्मरण में महमूद ने लिखा कि 1993 में उनका बायपास ऑपरेशन ब्रीच कैंडी अस्पताल में हुआ था। उसी अस्पताल में अमिताभ बच्चन के पिता हरिवंश राय बच्चन भी भर्ती थे। महमूद के मुताबिक अमिताभ रोज अपने पिता से मिलने अस्पताल आते थे, लेकिन उनसे मिलने के लिए पांच मिनट भी नहीं निकाले। महमूद ने साफ लिखा कि इस बात ने उन्हें चोट पहुंचाई थी। उन्होंने यह भी कहा कि अमिताभ उनके लिए बेटे जैसे थे।

इसलिए यह कहना ज्यादा सही होगा कि महमूद के मन में अमिताभ को लेकर एक गहरी शिकायत और चोट थी, न कि यह कहना कि दोनों के बीच किसी तरह की दुश्मनी थी। उपलब्ध स्रोतों में महमूद की अपनी शिकायत दर्ज है; इसे बढ़ाकर “नफरत” कहना उचित नहीं होगा।

यही इस रिश्ते की त्रासदी भी है। एक तरफ वह व्यक्ति था जिसने संघर्ष कर रहे अमिताभ को अपने घर में जगह दी और फिल्म में बड़ा अवसर दिया। दूसरी तरफ जिंदगी के अंतिम दौर में वही महमूद इस बात से आहत थे कि अमिताभ अस्पताल में उनसे मिलने नहीं आए।


महमूद ने अपने बेटे लकी को फिल्म इंडस्ट्री की चकाचौंध से दूर रखा। छोटी उम्र में बोर्डिंग स्कूल भेज दिया। लकी ने बताया था कि पिता उन्हें इंडस्ट्री और लोगों से दूर रखना चाहते थे। साल भर स्कूल में रहने के बाद लगभग डेढ़ महीने की छुट्टी मिलती और वही समय पिता और मां दोनों के साथ बितता था। माता-पिता के अलग हो जाने के कारण उनका बचपन वैसे भी सामान्य नहीं था।

एक प्रसंग तो बेहद मार्मिक है। लकी जब बोर्डिंग स्कूल से लौटे और परिवार उन्हें लेने आया, तब उन्होंने अपने पिता को पहचानने के बजाय कहा, “अरे, ये तो फिल्मों वाले कॉमेडियन महमूद हैं!”

जिस आदमी को पूरा देश जानता था, उसका अपना बेटा उसे एक फिल्मी सितारे की तरह पहचान रहा था।

स्कूल में भी जब दूसरे बच्चों के माता-पिता उनसे मिलने आते, तो कई बार लोग महमूद के बेटे को देखने उसकी कक्षा तक पहुंच जाते। लकी ने बताया था कि वह हमेशा लोगों की नजरों में रहते थे।

लेकिन इस अकेलेपन ने उनके भीतर एक अलग स्वभाव पैदा किया। उन्होंने माना कि बोर्डिंग स्कूल ने उन्हें स्वतंत्र बना दिया। वह खुद फैसले लेने वाले इंसान बने और शायद यही स्वतंत्रता आगे चलकर उनके संगीत की सबसे बड़ी ताकत बनी।

महमूद के लिए लकी को अनुशासन में रखना सिर्फ कठोरता नहीं थी। उनके पास खुद संघर्ष का अनुभव था। इसलिए वह नहीं चाहते थे कि उनका बेटा केवल पिता की प्रसिद्धि पर जिए।

27 गाड़ियां होने के बावजूद लकी को एक कार नहीं मिली। कॉर्वेट चलाने की इच्छा भी पूरी नहीं हुई। रोज पांच रुपये और शाम को हिसाब। बस से सफर। 21 साल की उम्र तक डेट पर जाने की भी इजाजत नहीं और शाम छह बजे के बाद बाहर निकलना बंद। लकी ने इन बातों को याद करते हुए अपने पिता को केवल कठोर नहीं कहा। उन्होंने यह भी बताया कि महमूद घर में बेहद मजाकिया थे और जब भी उन्हें कोई गहरी परेशानी होती, वह पिता के पास जाते थे। उनके लिए महमूद ‘गो-टू पर्सन’ थे, वह आदमी जिसके पास हमेशा कोई सलाह या हौसला होता था।

यानी पिता-पुत्र का रिश्ता सीधा नहीं था। उसमें दूरी भी थी, अनुशासन भी, शिकायतें भी और बहुत गहरा अपनापन भी।

लकी अली ने अभिनय में हाथ आजमाया। लेकिन उनका मन वहां नहीं लगा। उन्होंने आखिर संगीत को अपना रास्ता चुना।

1996 में उनका एल्बम ‘सुनो’ आया और ‘ओ सनम’ ने उनकी जिंदगी बदल दी। शुरुआत में कई रिकॉर्ड कंपनियां उनके संगीत को लेकर आश्वस्त नहीं थीं। बाद में महेश माथाई के निर्देशन में ‘ओ सनम’ का वीडियो मिस्र के काहिरा और पिरामिडों की पृष्ठभूमि में शूट हुआ। यही वीडियो लकी अली की पहचान बन गया। ‘सुनो’ को MTV Asia चार्ट पर 60 सप्ताह रहने और लकी को पुरस्कार मिलने का श्रेय भी मिलता है।

फिर वह दौर आया जब लकी अली की आवाज सिर्फ एक गायक की आवाज नहीं रही। ‘एक पल का जीना’, ‘ना तुम जानो ना हम’, ‘आ भी जा’, ‘आहिस्ता आहिस्ता’, ‘हैरत’ और ‘सफरनामा’ जैसे गीतों ने अलग-अलग पीढ़ियों को उनसे जोड़ा।

उनकी आवाज में वह चमक नहीं थी जो पारंपरिक फिल्मी गायकों की पहचान होती है। उसमें एक उदासी थी, एक सादगी थी और जैसे कोई ऐसा आदमी गा रहा हो जिसने जिंदगी को बहुत पास से देखा हो।

फिर एक-एक करके लोग जाते गए। लकी ने अपनी मां को 1993 में खोया। उनके भाई मैकी का 2002 में निधन हुआ। फिर 23 जुलाई 2004 को महमूद भी चले गए।

महमूद अमेरिका के पेन्सिलवेनिया में दिल की बीमारी के इलाज के लिए गए थे और वहीं नींद में उनका निधन हुआ। बाद में उनका पार्थिव शरीर बेंगलुरु के बाहर यलहंका स्थित अली एस्टेट्स लाया गया, जहां उनका अंतिम संस्कार हुआ। परिवार के इस फार्महाउस में निजी कब्रिस्तान भी है और उपलब्ध विवरणों के अनुसार महमूद को उनके पिता मुमताज अली के सफेद मकबरे के पास एक साधारण, बिना नाम वाली कब्र में दफनाया गया।

मौत से पहले महमूद ने लकी से अपने भाइयों की जिम्मेदारी संभालने की बात कही थी। लकी ने बाद में स्वीकार किया कि वह इस जिम्मेदारी को पूरी तरह निभा नहीं सके। सबकी अपनी-अपनी दिशाएं थीं और पिता के जाने के बाद परिवार को एक जगह जोड़कर रखने वाला व्यक्ति नहीं रहा।

यह स्वीकारोक्ति भी लकी अली के स्वभाव जैसी ही थी, बिना किसी सफाई के, बिना किसी नाटक के।

मुख्यधारा की फिल्म और संगीत की दुनिया से लकी अली धीरे-धीरे दूर होते गए। लेकिन इंटरनेट ने उन्हें फिर खोज लिया। 2020 के आसपास उनके अनौपचारिक संगीत वीडियो नई पीढ़ी में वायरल होने लगे। लोगों ने महसूस किया कि जिस आवाज को वे 1990 के दशक में सुनते हुए बड़े हुए थे, वह आज भी उतनी ही सच्ची लगती है।

और 22 नवंबर 2025 कोलकाता में उनका कॉन्सर्ट देखने वालों की भीड़ ने साबित कर दिया कि लकी अली सिर्फ 90 के दशक के गायक नहीं हैं। मैदान में ऐसे युवा भी थे जो 1996 में पैदा तक नहीं हुए थे, लेकिन उन्हें ‘ओ सनम’ और ‘आ भी जा’ के शब्द याद थे।

तीन दशक बाद भी लोग उनकी आवाज सुनने के लिए जमा होते हैं।

2026 में लकी अली के संगीत की उस यात्रा को तीन दशक पूरे हो चुके हैं, जिसने उन्हें भारतीय पॉप संगीत का एक अलग चेहरा बनाया। इसी दौर में उनके इंटरव्यू में शोहरत, जिंदगी और स्थायित्व को लेकर उनका दार्शनिक नजरिया भी सामने आया।

और फिर अगस्त 2026 में मंच पर उन्होंने कहा कि वह मौत के लिए तैयार हैं और अपने सफर में इहराम साथ रखते हैं। यह बात सुनकर उनके प्रशंसकों ने उन्हें लंबी उम्र की शुभकामनाएं दीं। लेकिन लकी अली शायद उन लोगों में से हैं जो जिंदगी को उसकी अंतिम सीमा से अलग करके नहीं देखते।

उनकी कहानी में बचपन से ही एक दूरी रही, पिता से दूरी, मां से दूरी, फिल्म इंडस्ट्री से दूरी और बाद में खुद मुख्यधारा से दूरी। लेकिन इन दूरियों के बीच कुछ रिश्ते ऐसे थे जो लगातार उनके साथ रहे। उनमें सबसे बड़ा रिश्ता उनके पिता का था। शायद वह कफन नहीं, एक स्मृति साथ लेकर चलते हैं

महमूद ने बेटे को अपनी 27 गाड़ियों में से एक नहीं दी। उसे रोज पांच रुपये दिए। बस में भेजा। हिसाब मांगा। फिल्मी दुनिया से दूर रखा। लेकिन जब बेटा बड़ा हुआ, तब वही पिता उसके लिए सलाह और हौसले का सबसे बड़ा सहारा बन गया।

दोनों ने साथ उमराह किया। और आज बेटा अपने सफर में इहराम साथ लेकर चलता है। इसीलिए लकी अली की यह बात केवल मृत्यु के बारे में नहीं लगती। इसमें जीवन की एक पूरी यात्रा छिपी है। एक ऐसा बच्चा, जिसे पिता ने आत्मनिर्भर बनाना चाहा।

एक ऐसा कलाकार, जिसने पिता की छाया से बाहर निकलकर अपनी पहचान बनाई। एक ऐसा बेटा, जिसने पिता से दूरी भी महसूस की और उन्हें अपना सबसे भरोसेमंद व्यक्ति भी माना। और अब एक ऐसा बूढ़ा होता कलाकार, जो अपने अंतिम कपड़े को पहले से अपने साथ रखता है। शायद यह मृत्यु का डर नहीं है। शायद यह मृत्यु की स्वीकार्यता है।

और शायद इससे भी ज्यादा, यह उस पिता की स्मृति है, जिसके साथ उसने जिंदगी के सबसे खास सफेद कपड़ों में से एक बार उमराह किया था।

महमूद के पास 27 गाड़ियां थीं। लकी को उनमें से एक भी नहीं मिली। लेकिन पिता ने शायद उसे उससे कहीं बड़ी चीज दी, अपने पैरों पर खड़े होने की आदत। आज लकी अली के पास अपना रास्ता है, अपनी आवाज है और अपने गीत हैं। और बैग में एक सफेद इहराम। जिसे वह अपना कफन कहते हैं।

शायद आखिर में इंसान अपने साथ वही लेकर चलता है जो उसे सबसे ज्यादा प्रिय रहा हो, कभी कोई गीत, कभी कोई तस्वीर और कभी पिता की एक पुरानी याद।

Vishal Sharma
Vishal Sharma

Vishal Sharma is an experienced Indian journalist, cyber security consultant, social activist, and poet writing under the pen name Surur Akbarabadi. With over two decades in journalism, he has worked across print, digital, and TV media, including notable roles at The Indian Express, The Pioneer, Indo-American Times, and Business Standard. He is currently the editor of Agra24.in, a bilingual news portal focused on Agra, which he co-founded to provide in-depth analysis and balanced reporting. Based in Agra and Lucknow, Vishal balances his professional commitments with family life. Academically, he has studied Life Sciences, Law, and Business Management. His journalism covers current affairs, business, and social issues, with a focus on factual reporting and avoiding controversial topics that could harm social harmony. He actively promotes communal harmony through his role as Vice-Chairman of Hindustani Biradari, an organization founded to emphasize unity beyond religion and caste. He is also Secretary of the Agra Tourist Welfare Chamber and was also a member of Agra’s Heritage and History Conservation Committee, working to preserve the city’s cultural heritage. Professionally, Vishal brings his cyber security expertise to his media work, enhancing the technical and editorial quality of his news platforms. His interests include photography and travel, particularly exploring India’s diverse landscapes and cultural heritage sites. His contributions reflect a steady commitment to journalism, cultural preservation, and social cohesion without excessive embellishment.

By Vishal Sharma

Vishal Sharma is an experienced Indian journalist, cyber security consultant, social activist, and poet writing under the pen name Surur Akbarabadi. With over two decades in journalism, he has worked across print, digital, and TV media, including notable roles at The Indian Express, The Pioneer, Indo-American Times, and Business Standard. He is currently the editor of Agra24.in, a bilingual news portal focused on Agra, which he co-founded to provide in-depth analysis and balanced reporting. Based in Agra and Lucknow, Vishal balances his professional commitments with family life. Academically, he has studied Life Sciences, Law, and Business Management. His journalism covers current affairs, business, and social issues, with a focus on factual reporting and avoiding controversial topics that could harm social harmony. He actively promotes communal harmony through his role as Vice-Chairman of Hindustani Biradari, an organization founded to emphasize unity beyond religion and caste. He is also Secretary of the Agra Tourist Welfare Chamber and was also a member of Agra’s Heritage and History Conservation Committee, working to preserve the city’s cultural heritage. Professionally, Vishal brings his cyber security expertise to his media work, enhancing the technical and editorial quality of his news platforms. His interests include photography and travel, particularly exploring India’s diverse landscapes and cultural heritage sites. His contributions reflect a steady commitment to journalism, cultural preservation, and social cohesion without excessive embellishment.

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