⭐⭐⭐½
हँसी, भ्रम और रिश्तों की उलझनों से सजी एक मनोरंजक पारिवारिक कॉमेडी
आजकल कॉमेडी फिल्मों में सबसे बड़ी चुनौती दर्शकों को बिना फूहड़ता का सहारा लिए हँसाना है। पति-पत्नी और वो दो इस कसौटी पर काफी हद तक खरी उतरती है। यह फिल्म कोई सामाजिक संदेश देने या रिश्तों की गहरी परतें खोलने का दावा नहीं करती, बल्कि शुरुआत से अंत तक दर्शकों का मनोरंजन करने के उद्देश्य से बनाई गई है। इसकी कहानी पूरी तरह “कॉमेडी ऑफ एरर्स” की शैली पर आधारित है, जहाँ एक छोटी-सी गलतफहमी धीरे-धीरे इतनी बड़ी बन जाती है कि हर नया दृश्य पहले से अधिक मज़ेदार और अप्रत्याशित लगता है।
आयुष्मान खुराना एक बार फिर अपने सहज अभिनय से फिल्म को मजबूती देते हैं। उनका किरदार परिस्थितियों में उलझता है, उनसे निकलने की कोशिश करता है और हर बार खुद को पहले से बड़ी मुश्किल में फँसा लेता है। उनकी कॉमिक टाइमिंग पहले की तरह प्रभावी है और यही फिल्म की सबसे बड़ी ताकत भी है। वामिका गब्बी ने शानदार अभिनय किया है और कई दृश्यों में वे सबसे अधिक प्रभाव छोड़ती हैं। रकुल प्रीत सिंह और सारा अली खान अपने-अपने किरदारों में स्वाभाविक लगती हैं और कहानी को संतुलित बनाए रखती हैं। वहीं विजय राज़ अपनी बेहतरीन संवाद-अदायगी और चेहरे के हावभाव से कई दृश्यों में अतिरिक्त हास्य जोड़ देते हैं।
फिल्म का पहला भाग किरदारों और परिस्थितियों को स्थापित करने में थोड़ा समय लेता है। कुछ जगह इसकी गति धीमी महसूस होती है, लेकिन इंटरवल के बाद कहानी रफ्तार पकड़ लेती है। इसके बाद गलतफहमियों, झूठ और संयोगों का ऐसा सिलसिला शुरू होता है जो लगातार दर्शकों को हँसाता रहता है। पटकथा की सबसे बड़ी खूबी यह है कि अधिकांश हास्य परिस्थितियों से पैदा होता है, न कि केवल संवादों से। यही वजह है कि कई दृश्य लंबे समय तक याद रह जाते हैं।
हालाँकि फिल्म पूरी तरह दोषरहित नहीं है। कुछ घटनाएँ वास्तविकता से काफी दूर लगती हैं और कुछ कॉमिक स्थितियों को आवश्यकता से अधिक लंबा खींचा गया है। क्लाइमैक्स तक पहुँचते-पहुँचते पटकथा थोड़ी बिखरी हुई महसूस होती है और यदि संपादन थोड़ा और कसा हुआ होता तो फिल्म का प्रभाव और बेहतर हो सकता था। कुछ सहायक पात्रों को भी पर्याप्त विकास नहीं मिल पाता, जिसके कारण वे केवल कहानी को आगे बढ़ाने का माध्यम बनकर रह जाते हैं।
तकनीकी पक्ष की बात करें तो फिल्म का संगीत कहानी के साथ सहज रूप से चलता है। गाने मनोरंजन में बाधा नहीं बनते और बैकग्राउंड स्कोर हास्य दृश्यों को प्रभावी बनाने में मदद करता है। सिनेमैटोग्राफी रंगीन और आकर्षक है तथा फिल्म का हल्का-फुल्का माहौल अंत तक बना रहता है।
कुल मिलाकर पति-पत्नी और वो दो ऐसी फिल्म है जिसे परिवार या दोस्तों के साथ बिना किसी विशेष अपेक्षा के देखा जाए तो यह भरपूर मनोरंजन करती है। यह कोई यादगार क्लासिक कॉमेडी नहीं बनती, लेकिन अपनी स्टारकास्ट, चुटीले संवाद, मनोरंजक परिस्थितियों और साफ-सुथरे हास्य के दम पर दर्शकों को निराश भी नहीं करती। यदि आप ऐसी फिल्म देखना चाहते हैं जो दो घंटे तक आपको मुस्कुराने और खुलकर हँसने का मौका दे, तो यह एक अच्छा विकल्प है।
अंतिम फैसला: कहानी में कुछ कमियाँ ज़रूर हैं, लेकिन मजबूत कलाकार, प्रभावी कॉमिक टाइमिंग और मनोरंजक पटकथा इन कमियों को काफी हद तक ढँक देती है। हल्के-फुल्के मनोरंजन की तलाश करने वाले दर्शकों के लिए यह फिल्म एक बार अवश्य देखी जा सकती है।

