दुनिया के सबसे अधिक देखे जाने वाले स्मारकों में शामिल ताजमहल में प्रवेश करने वाले पर्यटकों की संख्या पर आने वाले समय में दैनिक या प्रति घंटे की सीमा लगाई जा सकती है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने ताजमहल की वास्तविक ‘कैरीइंग कैपेसिटी’ यानी एक समय में पर्यटकों का कितना दबाव स्मारक सुरक्षित रूप से सहन कर सकता है, इसका अध्ययन आईआईटी दिल्ली के विशेषज्ञों से कराने की प्रक्रिया शुरू की है।
आईआईटी दिल्ली के सिविल इंजीनियरिंग विभाग की तीन सदस्यीय टीम मई में ताजमहल परिसर का निरीक्षण कर चुकी है। टीम ने मुख्य मकबरे, पूर्वी प्रवेश द्वार, रॉयल गेट और उन स्थानों का अध्ययन किया जहां पर्यटक अपेक्षाकृत अधिक देर रुकते हैं। पर्यटकों को प्रवेश में लगने वाले समय, परिसर के भीतर उनके आवागमन, फोटो खिंचाने के कारण बनने वाले भीड़-बिंदुओं और मुख्य मकबरे के अंदर एक समय में मौजूद पर्यटकों की संख्या का भी आकलन किया गया। एएसआई के अनुसार आईआईटी दिल्ली को यह बताना है कि पूरे ताजमहल परिसर और मुख्य मकबरे में एक समय में अधिकतम कितने पर्यटकों को रहने दिया जाना चाहिए।
इस अध्ययन की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता। लगातार लाखों लोगों की आवाजाही का प्रभाव केवल भीड़ प्रबंधन तक सीमित नहीं है। मुख्य मकबरे के बंद और अपेक्षाकृत कम हवादार हिस्सों में मानव उपस्थिति से तापमान और आर्द्रता में बदलाव, पत्थर के फर्श पर निरंतर घर्षण, संगमरमर और जाली के निकट पर्यटकों का रुकना तथा संकरे रास्तों में दबाव संरक्षण से जुड़े वास्तविक प्रश्न हैं। लेकिन यह अध्ययन ऐसे शहर में हो रहा है जिसकी आर्थिक गतिविधियों का एक बड़ा भाग सीधे या परोक्ष रूप से ताजमहल आने वाले पर्यटकों पर निर्भर है। इसलिए रिपोर्ट का निष्कर्ष केवल संरक्षण संबंधी दस्तावेज नहीं, आगरा की भविष्य की आर्थिक दिशा तय करने वाला निर्णय भी बन सकता है।
एक वर्ष में 69.05 लाख टिकटधारी पर्यटक
केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय के इंडिया टूरिज्म डेटा कम्पेंडियम 2025 के अनुसार वित्तीय वर्ष 2024-25 में ताजमहल देश का सर्वाधिक देखा गया टिकट वाला संरक्षित स्मारक रहा। इस अवधि में 62.60 लाख भारतीय और 6.45 लाख विदेशी पर्यटक ताजमहल पहुंचे। इस प्रकार कुल टिकटधारी पर्यटकों की संख्या लगभग 69.05 लाख रही। (Press Information Bureau)
ताजमहल शुक्रवार को बंद रहता है। साल के लगभग 313 खुले दिनों के आधार पर यह संख्या औसतन करीब 22 हजार टिकटधारी पर्यटक प्रति कार्यदिवस बैठती है। लेकिन यह वास्तविक फुटफॉल का पूरा आंकड़ा नहीं है, क्योंकि 15 वर्ष से कम आयु के बच्चों का प्रवेश निःशुल्क है और उनकी संख्या टिकट बिक्री के आंकड़ों में शामिल नहीं होती। एएसआई से जुड़े अधिकारियों के अनुसार सामान्य दिनों में लगभग 25 से 30 हजार लोग ताजमहल पहुंचते हैं, जबकि सप्ताहांत, सार्वजनिक अवकाश और पर्यटन के चरम दिनों में यह संख्या 50 हजार से ऊपर निकल जाती है।
इसका अर्थ यह भी है कि केवल वार्षिक औसत के आधार पर सीमा तय करना भ्रामक हो सकता है। गर्मी या मानसून के सामान्य कार्यदिवस और क्रिसमस, नववर्ष, लंबी छुट्टी अथवा स्वतंत्रता दिवस के आसपास का रविवार एक जैसी स्थितियां नहीं रखते। वास्तविक चुनौती पूरे वर्ष के पर्यटकों की संख्या नहीं, कुछ विशेष दिनों और सुबह-दोपहर के कुछ घंटों में होने वाला असमान जमाव है।
नीरी ने पहले 6,000 पर्यटक प्रति घंटे की सीमा सुझाई थी
ताजमहल की वहन क्षमता का यह पहला अध्ययन नहीं है। एएसआई ने वर्ष 2012 में राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (नीरी) को भी अध्ययन सौंपा था। केंद्र सरकार ने अप्रैल 2015 में संसद को बताया था कि नीरी की मसौदा रिपोर्ट मिल चुकी है और अंतिम सिफारिशों के आधार पर अधिकतम पर्यटक संख्या निर्धारित की जाएगी। (Press Information Bureau)
बाद में सामने आई नीरी की विस्तृत रिपोर्ट में सुझाव दिया गया कि किसी भी समय ताजमहल परिसर में 9,000 से अधिक पर्यटक उपस्थित न हों, प्रति घंटे प्रवेश 6,000 तक सीमित रहे और व्यस्त दिनों में पर्यटकों के ठहरने की अवधि करीब डेढ़ घंटे रखी जाए। मुख्य मकबरे के अंदर एक समय में अधिकतम 350 पर्यटकों का सुझाव दिया गया था। रिपोर्ट ने हर दिन कठोर प्रतिबंध लगाने के बजाय सप्ताहांत, त्योहारों और पहले से चिन्हित ‘हाई फुटफॉल’ दिनों के लिए विशेष व्यवस्था का प्रस्ताव किया था।
नीरी की सभी सिफारिशें लागू नहीं हुईं। दिसंबर 2018 में मुख्य मकबरे में जाने के लिए ₹200 का अतिरिक्त टिकट लगाया गया और बाद में एक सामान्य टिकट पर ताजमहल परिसर में अधिकतम तीन घंटे रहने की व्यवस्था लागू की गई। इससे मुख्य मकबरे के भीतर दबाव कुछ कम हुआ, लेकिन पूरे परिसर में होने वाली पीक-आवर भीड़ की समस्या समाप्त नहीं हुई।
इसीलिए आईआईटी दिल्ली की नई रिपोर्ट को यह स्पष्ट करना होगा कि समस्या का समाधान एक कठोर दैनिक सीमा है, प्रति घंटे टाइम स्लॉट हैं, केवल मुख्य मकबरे की सीमा है अथवा इन तीनों का अलग-अलग संयोजन।
आगरा की अर्थव्यवस्था को केवल पर्यटन आधारित कहना तकनीकी रूप से पूरी तरह सही नहीं होगा। शहर में फुटवियर, धातु उत्पाद, ऑटो पार्ट्स, पंखे, पैकेजिंग और खाद्य उत्पादों से जुड़े हजारों छोटे उद्यम मौजूद हैं। जिला प्रशासन की आधिकारिक जानकारी के अनुसार आगरा में करीब 7,200 लघु औद्योगिक इकाइयां हैं। फुटवियर क्षेत्र में लगभग 60 संगठित इकाइयों, 3,000 छोटी निर्माण इकाइयों और हजारों घरेलू कारीगर परिवारों का उल्लेख किया गया है। हस्तशिल्प क्षेत्र में भी हजारों लोग कार्यरत हैं।
इसके बावजूद पर्यटन आगरा के शहरी सेवा क्षेत्र की धुरी है। हस्तशिल्प, मार्बल इनले, जरी-जरदोजी, होटल, गेस्ट हाउस, रेस्तरां, ट्रैवल एजेंसियां, टूर गाइड, फोटोग्राफर, टैक्सी और ऑटो चालक, ई-रिक्शा, बैटरी बसें, चमड़े और जूते की खुदरा दुकानें, पेठा-दालमोठ कारोबार तथा स्थानीय बाजार सभी पर्यटकों की आवाजाही से लाभ लेते हैं।
एक पर्यटक द्वारा खरीदा गया ताजमहल का टिकट आर्थिक गतिविधि की शुरुआत भर है। होटल में एक रात का ठहराव, वाहन, गाइड, भोजन, स्मृति-चिह्न और स्थानीय खरीद पर खर्च होने वाली राशि शहर में कई स्तरों पर रोजगार पैदा करती है। इसी कारण ताजमहल का एक दिन बंद रहना या पर्यटकों में अचानक गिरावट होटल से लेकर टैक्सी और हस्तशिल्प तक एक साथ दिखाई देती है।
आगरा की चिंता इसलिए अधिक गंभीर है क्योंकि शहर के औद्योगिक विस्तार पर ताजमहल के संरक्षण के कारण दशकों से असाधारण पर्यावरणीय प्रतिबंध लागू हैं। जब किसी शहर की औद्योगिक वृद्धि को राष्ट्रीय धरोहर की रक्षा के लिए सीमित किया गया हो, तब उसी धरोहर पर आने वाले पर्यटकों की संख्या में भारी कटौती का निर्णय उस शहर के लिए दोहरी आर्थिक बाधा बन सकता है।
ताज ट्रेपेजियम जोन, जिसे टीटीजेड कहा जाता है, ताजमहल के चारों ओर केवल दस या बीस किलोमीटर का स्थानीय क्षेत्र नहीं है। यह लगभग 10,400 वर्ग किलोमीटर में फैला एक विशाल समलंबाकार पर्यावरणीय क्षेत्र है। इसकी सीमाएं उत्तर प्रदेश के आगरा मंडल से राजस्थान के भरतपुर क्षेत्र तक जाती हैं। आधिकारिक टीटीजेड व्यवस्था में उत्तर प्रदेश के आगरा, मथुरा, फिरोजाबाद, हाथरस और एटा जिलों तथा राजस्थान के भरतपुर जिले के हिस्से शामिल हैं। इसके भीतर आगरा, मथुरा-वृंदावन, फिरोजाबाद, हाथरस, जलेसर क्षेत्र और भरतपुर सहित अनेक नगर, कस्बे, गांव और औद्योगिक क्षेत्र आते हैं। इसलिए इसे निश्चित संख्या वाले कुछ शहरों की सीमा कहना सही नहीं होगा; यह छह जिलों के हिस्सों में फैला अंतरराज्यीय पर्यावरणीय क्षेत्र है।
टीटीजेड का मौजूदा न्यायिक ढांचा पर्यावरणविद् एमसी मेहता की 1984 में दायर जनहित याचिका और सुप्रीम कोर्ट के 30 दिसंबर 1996 के ऐतिहासिक फैसले से विकसित हुआ। मामला ताजमहल के सफेद संगमरमर के पीला और काला पड़ने तथा उसके लिए औद्योगिक और वायु प्रदूषण को जिम्मेदार बताए जाने से जुड़ा था। अदालत के सामने सल्फर डाइऑक्साइड, कोयला और कोक जलाने वाले कारखाने, फाउंड्री, रासायनिक इकाइयां, ईंट भट्टे, जनरेटर, वाहनों का धुआं, मथुरा रिफाइनरी और फिरोजाबाद के कांच उद्योग जैसे स्रोत रखे गए थे।
सुप्रीम कोर्ट ने 292 कोयला अथवा कोक इस्तेमाल करने वाली औद्योगिक इकाइयों को प्राकृतिक गैस अपनाने का निर्देश दिया। ऐसा न कर पाने वाली इकाइयों को टीटीजेड से बाहर स्थानांतरित होने अथवा संचालन बंद करने को कहा गया। अदालत ने ‘प्रिकॉशनरी प्रिंसिपल’ और ‘पॉल्यूटर पेज प्रिंसिपल’ लागू करते हुए कहा कि ताजमहल जैसे स्मारक के मामले में प्रदूषण से नुकसान की मामूली आशंका भी नजरअंदाज नहीं की जा सकती।
इसके बाद केंद्र सरकार ने पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के तहत मई 1999 में ताज ट्रेपेजियम जोन प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण प्राधिकरण का ढांचा स्थापित किया, जिसे समय-समय पर पुनर्गठित किया गया। प्राधिकरण का कार्य प्रदूषण नियंत्रण, ताज संरक्षण योजनाओं की निगरानी, वाहनों और ईंधन के मानकों का पालन तथा टीटीजेड से जुड़े पर्यावरणीय मामलों पर कार्रवाई करना है। इस क्षेत्र में ताजमहल के साथ आगरा किला और फतेहपुर सीकरी जैसे तीन यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल भी हैं।
टीटीजेड में केवल ‘व्हाइट कैटेगरी’ यानी व्यावहारिक रूप से गैर-प्रदूषणकारी उद्योगों की अनुमति होने की बात लंबे समय से कही जाती रही है। लेकिन वर्तमान कानूनी स्थिति इससे कुछ अधिक जटिल है।
14 अक्टूबर 2024 के एक आदेश के बाद अदालत की अनुमति के बिना टीटीजेड में नई औद्योगिक इकाई स्थापित करने की प्रक्रिया लगभग रुक गई थी। मार्च 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने 1984 से चल रही मूल याचिका को औपचारिक रूप से बंद करते हुए टीटीजेड के लिए चार अलग स्वतः संज्ञान मामले बनाए, विजन डॉक्यूमेंट, वृक्ष एवं हरित क्षेत्र, उद्योगों का नियमन तथा जलाशयों एवं सीवेज का प्रबंधन। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पिछले सभी संरक्षण आदेश प्रभावी बने रहेंगे।
इसके बाद 23 जुलाई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने लगभग 400 लंबित औद्योगिक आवेदनों को संसाधित करने की अनुमति दी, लेकिन कठोर शर्तों के साथ। प्रत्येक आवेदन की बैठक में केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति और नीरी के एक-एक विशेषज्ञ की उपस्थिति अनिवार्य की गई। यदि दोनों में से कोई विशेषज्ञ प्रस्तावित इकाई को गैर-प्रदूषणकारी मानने से इनकार करता है, तो अदालत की अनुमति के बिना आवेदन स्वीकार नहीं किया जा सकता। विशेषज्ञों और टीटीजेड प्राधिकरण की सर्वसम्मति होने पर ही आवेदन आगे बढ़ सकता है। इस प्रकार पूर्ण औद्योगिक प्रतिबंध में कुछ ढील दी गई है, लेकिन प्रदूषणकारी उद्योगों के लिए रास्ता नहीं खोला गया।
यह कानूनी इतिहास उस आर्थिक असंतुलन को रेखांकित करता है जिसका सामना आगरा करता रहा है। शहर ने ताजमहल की सुरक्षा के लिए औद्योगिक प्रतिबंधों, ईंधन परिवर्तन, इकाइयों के स्थानांतरण और निर्माण संबंधी सीमाओं को स्वीकार किया। इसलिए स्थानीय पर्यटन क्षेत्र का तर्क है कि पर्यटकों की संख्या घटाने जैसा कोई भी निर्णय केवल स्मारक परिसर की गणना के आधार पर नहीं, शहर पर उसके समग्र प्रभाव को देखते हुए लिया जाना चाहिए।
आगरा टूरिस्ट वेलफेयर चैंबर के अध्यक्ष प्रहलाद अग्रवाल ने ताजमहल के संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता बताते हुए कहा कि आईआईटी दिल्ली की रिपोर्ट के आधार पर पर्यटकों की संख्या में कोई अत्यधिक या अचानक कटौती नहीं की जानी चाहिए।
उनके अनुसार आगरा के होटल, गाइड, ट्रांसपोर्टर, फोटोग्राफर, हस्तशिल्प कारोबारी और छोटे दुकानदार ताजमहल पर आने वाले पर्यटकों से जुड़े हैं। औद्योगिक गतिविधियों पर पहले से लागू प्रतिबंधों के बीच पर्यटन ही शहर के लिए रोजगार और आय का सबसे महत्वपूर्ण सहारा बन गया है। इसलिए ऐसी व्यवस्था तैयार होनी चाहिए जिसमें स्मारक पर एक समय में भीड़ कम हो, लेकिन पूरे दिन आने वाले पर्यटकों की संख्या अनावश्यक रूप से न घटे।
अग्रवाल ने प्रतिदिन एक कठोर संख्या निर्धारित करने के बजाय प्रति घंटे प्रवेश, अग्रिम टाइम स्लॉट, व्यस्त और सामान्य दिनों के लिए अलग क्षमता, मुख्य मकबरे और बाहरी परिसर की अलग सीमा तथा ताजमहल के दर्शन की अवधि बढ़ाने जैसे विकल्पों का अध्ययन करने की मांग की है।
उन्होंने बताया कि ताजमहल का सामान्य दर्शन समय सूर्योदय से सूर्यास्त तक है। उत्तर प्रदेश पर्यटन की आधिकारिक वेबसाइट इसे सूर्योदय से 30 मिनट पहले से सूर्यास्त के 30 मिनट पहले तक बताती है। शुक्रवार को स्मारक सामान्य पर्यटकों के लिए बंद रहता है। रात्रि दर्शन केवल पूर्णिमा, उससे दो दिन पहले और दो दिन बाद सीमित संख्या में कराया जाता है; शुक्रवार और रमजान के दौरान यह सुविधा उपलब्ध नहीं होती। नियमित रूप से पर्यटकों के लिए कृत्रिम प्रकाश में ताजमहल देखने की व्यवस्था नहीं है।
अग्रवाल के अनुसार यदि वैज्ञानिक रूप से सुरक्षित पाया जाए तो दर्शन की अवधि शाम तक बढ़ाना भीड़ प्रबंधन का एक वैकल्पिक उपाय हो सकता है। अभी उपलब्ध सीमित घंटों में बड़ी संख्या में पर्यटक सुबह, दोपहर और सूर्यास्त से पहले एकत्र होते हैं। समान संख्या को अधिक घंटों में बांटने से एक समय में परिसर के भीतर मौजूद लोगों की संख्या घट सकती है। इससे दैनिक पर्यटक संख्या घटाए बिना मुख्य मकबरे, रॉयल गेट और फोटो पॉइंट पर दबाव कम करने की संभावना बनती है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि ताजमहल पर तुरंत तेज फ्लडलाइट लगा दी जाए। कृत्रिम प्रकाश का संगमरमर, मूल्यवान पत्थरों की पच्चीकारी, सतह के तापमान, नमी, जैविक वृद्धि, पक्षियों और यमुना तट के कीटों पर क्या प्रभाव होगा, इसका अलग वैज्ञानिक अध्ययन आवश्यक है।
विशेषज्ञों के अनुसार ताजमहल के यमुना की ओर वाले हिस्से पर हाल के वर्षों में गोएल्डीचिरोनोमस समूह के कीटों के उत्सर्जन से हरे और भूरे धब्बे दिखाई देते रहे हैं। ये कीट प्रदूषित और ठहरे हुए नदी जल के आसपास बड़ी संख्या में पनपते हैं। इनके कारण बार-बार संगमरमर की सफाई करनी पड़ती है और अत्यधिक या अनुचित सफाई स्वयं नाजुक सतह और पच्चीकारी के लिए जोखिम बन सकती है। समस्या के दीर्घकालिक समाधान के लिए एएसआई पहले भी अध्ययन शुरू कर चुका है।
कृत्रिम प्रकाश संबंधी अंतरराष्ट्रीय शोध बताता है कि अनेक उड़ने वाले कीट छोटी तरंगदैर्घ्य वाले नीले अथवा पराबैंगनी प्रकाश की ओर अधिक आकर्षित होते हैं, जबकि लंबी तरंगदैर्घ्य वाले प्रकाश की ओर आकर्षण सामान्यतः कम हो सकता है। लेकिन यह प्रभाव हर प्रजाति में समान नहीं है। केवल ‘वार्म व्हाइट’ बल्ब चुन लेना भी पर्याप्त समाधान सिद्ध नहीं हुआ है। प्रकाश की दिशा, तीव्रता, नदी से दूरी, संचालन का समय और प्रकाश स्रोत की बनावट भी कीटों के व्यवहार को प्रभावित करती है।
इसीलिए ताजमहल के लिए एक नया और स्थल-विशिष्ट अध्ययन होना चाहिए। इसमें अलग-अलग तरंगदैर्घ्य, बेहद कम प्रकाश तीव्रता, शील्डेड और नीचे की ओर निर्देशित लाइट, संचालन की सीमित अवधि तथा यमुना की ओर प्रकाश फैलने से रोकने के विकल्पों का परीक्षण किया जा सकता है। साथ ही यह देखा जाना चाहिए कि कौन-सा प्रकाश ताजमहल के संगमरमर और पच्चीकारी पर तापीय या रासायनिक प्रभाव नहीं डालता तथा गोएल्डीचिरोनोमस कीटों को न्यूनतम आकर्षित करता है।
जब तक ऐसे अध्ययन के परिणाम उपलब्ध न हों, रात्रिकालीन प्रकाश व्यवस्था को संरक्षण का समाधान मानना जल्दबाजी होगी। लेकिन बिना वैज्ञानिक परीक्षण के इसे स्थायी रूप से असंभव मान लेना भी उतना ही अवैज्ञानिक होगा।
पर्यटन से जुड़े व्यवसायियों का कहना है कि आईआईटी दिल्ली की रिपोर्ट को स्पष्ट करना होगा कि प्रस्तावित सीमा पूरे ताजमहल परिसर के लिए होगी या केवल मुख्य मकबरे के लिए; संख्या प्रतिदिन तय होगी या प्रति घंटा; क्या सप्ताहांत और सामान्य दिनों के लिए अलग मानक होंगे; निःशुल्क प्रवेश पाने वाले बच्चों की गणना कैसे होगी; और क्या प्रवेश को अग्रिम टाइम स्लॉट से जोड़ा जाएगा।
रिपोर्ट को यह भी बताना चाहिए कि पर्यटकों से वास्तव में किस प्रकार की क्षति दर्ज हुई है। आर्द्रता, सतह के तापमान, कार्बन डाइऑक्साइड, पत्थर के घिसाव और कंपन का मापन किन उपकरणों और कितनी अवधि में किया गया? क्या अध्ययन गर्मी, सर्दी, मानसून और पर्यटन के चरम मौसम का प्रतिनिधित्व करता है, या निष्कर्ष केवल कुछ घंटों के निरीक्षण पर आधारित होंगे?
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या रिपोर्ट सार्वजनिक की जाएगी। ताजमहल राष्ट्रीय और विश्व धरोहर है, लेकिन उससे जुड़े फैसलों से लाखों स्थानीय निवासियों की आजीविका भी प्रभावित होती है। इसलिए अंतिम निर्णय से पहले एएसआई, आईआईटी दिल्ली, स्थानीय प्रशासन, पर्यटन संगठनों, संरक्षण विशेषज्ञों, होटल उद्योग, गाइड संगठनों और नागरिक प्रतिनिधियों के बीच खुली चर्चा आवश्यक है।
ताजमहल को भीड़ से होने वाले नुकसान से बचाना अनिवार्य है। लेकिन संरक्षण का अर्थ केवल प्रवेश रोकना नहीं हो सकता। वैज्ञानिक टाइम स्लॉट, बेहतर प्रवेश मार्ग, मुख्य मकबरे के लिए अलग क्षमता, आगरा के अन्य स्मारकों की ओर पर्यटकों का वितरण, दर्शन के घंटों का विस्तार और सुरक्षित प्रकाश व्यवस्था पर शोध, इन सभी विकल्पों को एक साथ देखना होगा।
आगरा ने ताजमहल को बचाने के लिए दशकों से औद्योगिक विस्तार पर लगी सीमाओं की आर्थिक कीमत चुकाई है। अब आवश्यकता ऐसी नीति की है जो ताजमहल को अगली कई शताब्दियों तक सुरक्षित भी रखे और उस शहर को आर्थिक रूप से कमजोर भी न करे जिसकी पहचान, प्रतिष्ठा और आजीविका इसी स्मारक से जुड़ी हुई है।

