
भारतीय इतिहास के पन्नों में १६वीं शताब्दी का उत्तरार्ध साम्राज्यवादी विस्तार और उसके खिलाफ उपजे जन-प्रतिरोध की अनूठी दास्तानों से भरा है। जब भी इस दौर के सबसे चर्चित संघर्ष यानी हल्दीघाटी युद्ध (१८ जून १५७६) का जिक्र होता है, तो मानस पटल पर मुख्य रूप से महाराणा प्रताप और मुगल सम्राट अकबर की तस्वीरें उभरती हैं। लेकिन इस ऐतिहासिक युद्ध का एक ऐसा पहलू भी है जो राष्ट्रवाद, वफादारी और सांप्रदायिक सौहार्द की परिभाषा को एक नया आयाम देता है, और वह नाम है, खानजादा हकीम ख़ान सूरी। महाराणा प्रताप की सेना के सेनापति के रूप में मुगलों के दांत खट्टे करने वाले हकीम ख़ान सूरी का इतिहास इस बात का जीवंत प्रमाण है कि हल्दीघाटी की लड़ाई मजहबी नहीं, बल्कि संप्रभुता और स्वाभिमान की लड़ाई थी, जिसका समर्थन सुप्रसिद्ध आधुनिक इतिहासकार डॉ. गोपीनाथ शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘मेवाड़ एंड द मुगल एम्परर्स’ में विस्तार से किया है।
हकीम ख़ान सूरी का मेवाड़ आना और महाराणा प्रताप का हाथ थामना कोई आकस्मिक घटना नहीं थी, बल्कि इसके पीछे पीढ़ियों पुरानी राजनैतिक और पारिवारिक पृष्ठभूमि थी। प्रसिद्ध इतिहासकार अबुल फजल ने अकबर के आधिकारिक इतिहास ‘अकबरनामा’ में और समकालीन इतिहासकार अब्दुल कादिर बदायूनी ने ‘मुंतखब-उत-तवारीख’ में इस बात की पुष्टि की है कि हकीम ख़ान महान अफगान शासक शेरशाह सूरी के वंशज (सूरी राजवंश के खानजादा) थे। उनके पिता खैसा ख़ान सूरी थे। चूँकि १५५५-५६ ई. में मुगलों ने हुमायूँ और बाद में बैरम खान के नेतृत्व में सूरी वंश को दिल्ली की सत्ता से बेदखल कर दिया था, इसलिए अफगानों के मन में मुगलों के प्रति गहरा असंतोष और प्रतिशोध की भावना थी। हकीम ख़ान सूरी एक बेहद कुशल तोपची और सैन्य रणनीतिकार थे, और इतिहासकार जदुनाथ सरकार ने अपनी पुस्तक ‘मिलिट्री हिस्ट्री ऑफ इंडिया’ में लिखा है कि जब उन्होंने देखा कि राजपूताना में महाराणा प्रताप अकेले अकबर की विस्तारवादी नीतियों के खिलाफ अडिग खड़े हैं, तो उन्हें मुगलों को रोकने का सबसे सही और मजबूत मंच मेवाड़ में दिखाई दिया।
वर्ष १५७६ के शुरुआती महीनों में हकीम ख़ान सूरी अपने साथ लगभग ८०० से १,००० कुशल अफगान लड़ाकों और बिहार व दक्कन से लाए गए हल्के तोपखाने (Artillery) के विशेषज्ञों को लेकर मेवाड़ पहुँचे, जिसका उल्लेख कविराज श्यामलदास ने मेवाड़ के आधिकारिक इतिहास ग्रंथ ‘वीर विनोद’ में किया है। महाराणा प्रताप पारखी नजरों के धनी थे और उन्होंने हकीम ख़ान की वफादारी और सैन्य कौशल को तुरंत भांप लिया। राजपूत सैन्य परंपरा के अनुसार ‘हरावल’ यानी सेना की सबसे अग्रिम पंक्ति, जो दुश्मन पर सबसे पहला और घातक हमला करती है, उसका नेतृत्व हमेशा सिसोदिया वंश के सबसे भरोसेमंद सामंतों (जैसे कि सलूंबर के रावत चूंडावत) को ही दिया जाता था। लेकिन महाराणा प्रताप ने इस रूढ़िवादी परंपरा से हटकर यह सर्वोच्च पद एक अफगान मुस्लिम को सौंपा, जिसका संदर्भ मेवाड़ के ऐतिहासिक स्रोतों जैसे ‘राणा रासो’ और आधुनिक इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड की पुस्तक ‘अनाल्स एंड एंटीक्विटीज ऑफ राजस्थान’ में मिलता है, जो यह दर्शाता है कि महाराणा को उनकी निष्ठा पर कितना अटूट विश्वास था।
१८ जून १५७६ को जब हल्दीघाटी के तंग पहाड़ी दर्रे में युद्ध का बिगुल बजा, तो रणनीति के अनुसार सबसे पहला और विनाशकारी प्रहार हकीम ख़ान सूरी के नेतृत्व वाले हरावल दस्ते ने ही किया। इस भीषण आक्रमण का सबसे बड़ा और अकाट्य प्रमाण युद्ध के चश्मदीद गवाह और मुगल इतिहासकार अब्दुल कादिर बदायूनी की पुस्तक ‘मुंतखब-उत-तवारीख’ (खण्ड २) से मिलता है। बदायूनी ने लिखा है कि अफगानों और राजपूतों का शुरुआती हमला इतना आक्रामक था कि सैयद हाशिम और जगन्नाथ कछवाहा के नेतृत्व वाली मुगल सेना की अग्रिम टुकड़ी के पैर उखड़ गए और मुगल सैनिक जान बचाकर करीब १५ किलोमीटर पीछे बनास नदी के किनारे (जिसे बदायूनी ने ‘लोहसिंह’ गाँव कहा है) भाग खड़े हुए। हकीम ख़ान सूरी ने अरावली की भौगोलिक स्थिति का बखूबी इस्तेमाल करते हुए मुगलों के बड़े घुड़सवार दल को भ्रमित कर दिया और उनकी संख्यात्मक बढ़त को शुरुआती घंटों में पूरी तरह बेअसर कर दिया।
युद्ध जैसे-जैसे आगे बढ़ा और मुगलों की अतिरिक्त रिज़र्व सेना (जिसका मनोबल मिहतर खान ने अकबर के आने की झूठी अफवाह फैलाकर बढ़ाया था) ने मैदान में मोर्चा संभाला, तब भी हकीम ख़ान सूरी पीछे नहीं हटे और वीरता से लड़ते हुए अंततः वीरगति को प्राप्त हुए। मेवाड़ की लोकश्रुतियों और ‘राजप्रशस्ति महाकाव्य’ जैसे ऐतिहासिक वृत्तांतों में उल्लेख मिलता है कि अपनी कर्मभूमि के प्रति उनका समर्पण ऐसा था कि शहीद होने के बाद भी उनके हाथ से तलवार नहीं छूटी थी, जिसके कारण उन्हें उनकी तलवार के साथ ही दफनाया गया। आज भी राजस्थान के राजसमंद जिले के खमनोर गाँव में रक्त तलाई के पास हकीम ख़ान सूरी की मज़ार (मकबरा) स्थित है, जिसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा एक ऐतिहासिक स्मारक के रूप में संरक्षित किया गया है और यह स्थान आज भी देशप्रेम, वफादारी और कौमी एकता के प्रतीक के रूप में लोगों को आकर्षित करता है।
हकीम ख़ान सूरी का इतिहास में होना आज के दौर के राजनैतिक और सामाजिक विमर्श के लिए एक बहुत बड़ी सीख है, क्योंकि यह अक्सर कुछ संकीर्ण विचारधाराओं द्वारा हल्दीघाटी के युद्ध को ‘हिंदू बनाम मुस्लिम’ का रूप देने की कोशिशों को पूरी तरह ध्वस्त कर देता है। डॉ. सतीश चंद्र ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘मिडिवल इंडिया’ में स्पष्ट किया है कि एक तरफ जहाँ महाराणा की सेना की अग्रिम कमान एक अफगान मुस्लिम के हाथ में थी और भील राजा राणा पूंजा उनका साथ दे रहे थे, वहीं दूसरी तरफ अकबर की मुगल सेना का नेतृत्व राजपूत राजा मानसिंह प्रथम और आसफ खान कर रहे थे, जिससे साफ होता है कि यह युद्ध धर्म का नहीं बल्कि स्वतंत्रता और क्षेत्रीय संप्रभुता को बचाने का था। आज के बदलते परिदृश्य में यह बेहद जरूरी है कि पाठ्यपुस्तकों और मुख्यधारा के विमर्श में हकीम ख़ान सूरी के योगदान को वह सम्मानजनक स्थान मिले जिसके वे हकदार हैं, ताकि उन्हें हल्दीघाटी के एक सह-नायक और भारत की साझा संस्कृति (गंगा-जमुनी तहज़ीब) के अमर पुरोधा के रूप में याद रखा जा सके।
प्रमुख ऐतिहासिक संदर्भ:
1. प्राथमिक स्रोत (समकालीन): ‘मुंतखब-उत-तवारीख’ – अब्दुल कादिर बदायूनी (युद्ध का चश्मदीद मुगल गवाह)।
2. प्राथमिक स्रोत (समकालीन): ‘अकबरनामा’ – अबुल फजल (मुगल दरबारी इतिहास)।
3. मेवाड़ के प्रामाणिक ग्रंथ: ‘वीर विनोद’ – कविराज श्यामलदास (मेवाड़ का आधिकारिक इतिहास)।
4. राजपूत स्रोत: ‘राणा रासो’, ‘राजप्रशस्ति महाकाव्य’ एवं स्थानीय लोकश्रुतियाँ।
5. आधुनिक इतिहासकार: ‘मेवाड़ एंड द मुगल एम्परर्स’ – डॉ. गोपीनाथ शर्मा; ‘मिलिट्री हिस्ट्री ऑफ इंडिया’ – सर जदुनाथ सरकार; ‘मिडिवल इंडिया’ – डॉ. सतीश चंद्र।


