रमज़ान माह के आखिरी जुमा ( शुक्रवार ) को “जुमा अलविदा” कहा जाता है। इस जुमे की नमाज़ शहर और गाँवों की सभी मस्जिदों में अता की जाती है। लेकिन आगरा की शाही जामा मस्जिद में बड़ी संख्या में लोग नमाज़ पढ़ने अन्य मस्जिदों से ज्यादा पहुँचते हैं। आसपास के ग्रामीण लोग यहाँ की नमाज़ में इसलिए शामिल होते हैं कि नमाज़ के बाद वह ईद के त्यौहार के लिए खरीददारी भी करते हैं। जामा मस्जिद में केवल 25-30 हज़ार लोगों की तादाद की जगह है, जब कि आ जाते हैं 70-80 हज़ार, जिसकी वजह से सड़क पर भी नमाज़ पढ़ी जाती रही है।
लेकिन इस बार शासन / प्रशासन की नई गाइड लाइन आने की वजह से सड़क पर नमाज पढ़ने की पाबंदी लगा दी गई है। इस लिए सभी मुस्लिम भाइयों से अपील की जाती है कि इस बार सड़क पर नमाज़ नहीं पढ़ें, बल्कि अपने – अपने मोहल्लों की मस्जिद में नमाज़ अता करें तथा शासन / प्रशासन की गाइड लाइन का पालन करें। अफवाहों पर ध्यान न दें, अवांछनीय तत्वों पर निगाह रखे और शान्ति भंग करने वालों की जानकारी होने पर पुलिस को सूचित करें, तथा कानून को हाथ में लेने की कोशिश न करें।
आगरा सुलहकुल की नगरी है। यहाँ की सांप्रदायिक एकता और भाईचारे का लोहा देश / विदेश में माना जाता है। इस शहर में ताजमहल एवं अन्य ऐतिहासिक इमारतों का दीदार करने विश्व के हर कोने का टूरिस्ट आता है। अगर यहाँ किसी तरह का उन्माद होता है तो केवल आगरा की ही नहीं बल्कि देश / प्रदेश की छवि धूमिल हो सकती है। इसलिए हमारा फ़र्ज़ बनता है इस शहर की छवि कतई धूमिल न होने दें।
डॉ सिराज क़ुरैशी
अध्यक्ष, हिंदुस्तानी बिरादरी संस्था
एवं भारत सरकार द्वारा कबीर पुरुस्कार से सम्मानित।
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