इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भाभी की हत्या के मामले में उम्रकैद की सज़ा काट रहे तिल्लुका उर्फ़ मनोज की अपील खारिज कर दी है। अदालत ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि मृतका का मृत्युपूर्व बयान (Dying Declaration) दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त, विश्वसनीय और कानूनी रूप से स्वीकार्य साक्ष्य है।
न्यायमूर्ति जस्टिस जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने अपील पर सुनवाई करते हुए ट्रायल कोर्ट के निर्णय में किसी भी प्रकार की कानूनी त्रुटि नहीं पाई।
मामला आगरा जिले के हिरनेर गांव का है। अभियोजन के अनुसार, 2 जुलाई 2015 की सुबह करीब 6:30 बजे घर के निर्माण कार्य के दौरान रसोई के उपयोग को लेकर हुए विवाद और उधार दिए गए 5,000 रुपये वापस मांगने पर तिल्लुका उर्फ़ मनोज ने अपनी भाभी सत्यवती पर तेल डालकर आग लगा दी।
गंभीर रूप से झुलसी सत्यवती को अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उपचार के दौरान 14 जुलाई 2015 को उनकी मृत्यु हो गई।
घटना के बाद पुलिस ने प्रारंभिक रूप से भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 307 (हत्या का प्रयास) और धारा 506 (आपराधिक धमकी) के तहत मुकदमा दर्ज किया था। पीड़िता की मृत्यु के बाद मामले को धारा 302 (हत्या) में परिवर्तित कर दिया गया।
जांच के दौरान पुलिस ने केवल तिल्लुका उर्फ़ मनोज के विरुद्ध आरोपपत्र दाखिल किया। परिवार के तीन अन्य सदस्यों के खिलाफ लगाए गए आरोप जांच में असत्य पाए गए।
बाद में अक्टूबर 2019 में विशेष न्यायाधीश ने आरोपी को दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास तथा 25 हजार रुपये के जुर्माने की सज़ा सुनाई थी, जिसे आरोपी ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
अपीलकर्ता की ओर से दलील दी गई कि मृत्युपूर्व बयान में पीड़िता ने सब्ज़ी के तेल से जलाए जाने का उल्लेख किया है, जबकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मिट्टी के तेल की गंध मिलने का जिक्र है। इसे अभियोजन के कथन में विरोधाभास बताया गया।
इसके अलावा यह भी कहा गया कि घटना का कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं था और आरोपी ने स्वयं पीड़िता को अस्पताल पहुंचाने में सहायता की थी, इसलिए उसे संदेह का लाभ मिलना चाहिए।
खंडपीठ ने कहा कि एफआईआर दर्ज कराने में हुई देरी अपने आप में अभियोजन के मामले को कमजोर नहीं करती। अदालत ने पाया कि अतिरिक्त नगर मजिस्ट्रेट द्वारा अस्पताल पहुंचकर पीड़िता का मृत्युपूर्व बयान दर्ज किया जाना इस बात का संकेत है कि पुलिस को घटना की जानकारी पहले ही मिल चुकी थी।
अदालत ने यह भी माना कि घटना की सूचना देने वाला पीड़िता का पति स्वयं घटनास्थल पर मौजूद नहीं था और पत्नी की गंभीर स्थिति से सदमे में होने के कारण एफआईआर दर्ज कराने में विलंब हुआ।
तेल के प्रकार को लेकर कथित विरोधाभास पर अदालत ने कहा कि पीड़िता लगभग 80 प्रतिशत तक झुलस चुकी थी, इसलिए ऐसी स्थिति में भ्रम की संभावना स्वाभाविक है। इसे ऐसा विरोधाभास नहीं माना जा सकता जिससे पूरे अभियोजन की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग जाए।
अदालत ने स्पष्ट किया कि मृत्युपूर्व बयान विश्वसनीय और सुसंगत है तथा उसी के आधार पर दोषसिद्धि कायम रखने में कोई कानूनी बाधा नहीं है। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने आरोपी की अपील खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई आजीवन कारावास की सज़ा को बरकरार रखा।
आगरा के शमसाबाद क्षेत्र में भाभी की हत्या के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आरोपी तिल्लुका उर्फ़ मनोज की अपील खारिज कर दी। अदालत ने मृत्युपूर्व बयान को विश्वसनीय मानते हुए उम्रकैद की सज़ा बरकरार रखी।

