उत्तर मध्य रेलवे (एनसीआर) की संसदीय सलाहकार समिति की प्रयागराज में आयोजित बैठक में अलीगढ़ से भाजपा सांसद सतीश गौतम ने जिले के 132 वर्ष पुराने दाऊद खां रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर “महाराणा प्रताप रेलवे स्टेशन” किए जाने की मांग उठाई। सांसद ने इससे पहले भी रेल मंत्री को इस संबंध में पत्र लिखा था। प्रस्ताव के दोबारा सामने आने के बाद स्टेशन के इतिहास और इसके नामकरण को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।
दाऊद खां रेलवे स्टेशन की स्थापना ब्रिटिश शासन के दौरान वर्ष 1894 में हुई थी। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार इसका नाम भीकमपुर रियासत के नवाब दाऊद खां शेरवानी के नाम पर रखा गया था। स्थानीय इतिहासकारों का कहना है कि स्टेशन का नाम किसी बाहरी शासक के बजाय उस समय के प्रभावशाली स्थानीय रियासती परिवार के सम्मान में रखा गया था।
इतिहासकार अशोक कुमार केशरी ने भी अपनी पुस्तक में भीकमपुर रियासत और नवाब दाऊद खां का उल्लेख किया है। वहीं अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के पूर्व जनसंपर्क अधिकारी एवं इतिहासकार डॉ. राहत अबरार भी मानते हैं कि स्टेशन का नाम भीकमपुर के नवाब दाऊद खां के नाम पर रखा गया था।
स्थानीय इतिहास के अनुसार शेरवानी परिवार मूल रूप से अफगानिस्तान से भारत आया था और बाद में अलीगढ़ क्षेत्र में बस गया। इसी परिवार की एक शाखा भीकमपुर रियासत से जुड़ी, जिसके प्रमुख नवाब दाऊद खां थे।
डॉ. राहत अबरार के अनुसार नवाब दाऊद खां केवल रियासत के मुखिया ही नहीं थे, बल्कि क्षेत्र के सामाजिक और सार्वजनिक जीवन में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
स्थानीय इतिहास में दर्ज एक रोचक प्रसंग के अनुसार वर्ष 1835 में आगरा किले के एक ऐतिहासिक द्वार की नीलामी हुई थी। बताया जाता है कि नवाब दाऊद खां ने वह विशाल दरवाजा खरीदकर अपनी भीकमपुर रियासत में स्थापित कराया।
बाद में उनके प्रपौत्र नवाब सआदत अली खां शेरवानी ने वही दरवाजा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को दान कर दिया। यह प्रवेश द्वार आज भी एएमयू के प्रसिद्ध भीकमपुर गेट (Bhikampur Gate) के रूप में जाना जाता है और विश्वविद्यालय की ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल है।
स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान प्रसिद्ध इस्लामी विद्वान और स्वतंत्रता संग्राम के समर्थक मौलाना फ़ज़ल-ए-हक़ खैराबादी अंग्रेजों के विरुद्ध फतवा जारी करने के बाद दिल्ली से निकले थे। बताया जाता है कि नवाब दाऊद खां ने उन्हें भीकमपुर में शरण दी और बाद में सुरक्षित रूप से बदायूं की ओर भेजने की व्यवस्था की।
हालांकि इस प्रसंग का उल्लेख मुख्यतः स्थानीय इतिहास और क्षेत्रीय स्रोतों में मिलता है तथा इस पर विस्तृत अकादमिक शोध सीमित है।
भीकमपुर रियासत के वंशजों का कहना है कि शेरवानी परिवार ने शिक्षा और चिकित्सा संस्थानों के विकास में उल्लेखनीय योगदान दिया। स्थानीय इतिहास में गांधी आई हॉस्पिटल, एमआई इंटर कॉलेज (सिकंदराराऊ), एफपीएम इंटर कॉलेज (इटावा) तथा किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज, लखनऊ सहित कई संस्थानों को भूमि और आर्थिक सहायता दिए जाने का उल्लेख मिलता है।
परिवार के वंशज आज भी दोदपुर क्षेत्र में रहते हैं और स्वयं को नवाब दाऊद खां की सातवीं पीढ़ी बताते हैं।
सांसद सतीश गौतम का कहना है कि स्टेशन का नाम बदलकर महाराणा प्रताप के नाम पर रखा जाना चाहिए। उनका तर्क है कि राष्ट्रीय नायकों के सम्मान में सार्वजनिक संस्थानों का नामकरण किया जाना चाहिए। उन्होंने इस संबंध में रेल मंत्रालय से औपचारिक अनुरोध किया है।
इतिहासकारों का कहना है कि उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोतों में महाराणा प्रताप का अलीगढ़ या भीकमपुर क्षेत्र से कोई प्रत्यक्ष ऐतिहासिक संबंध स्थापित नहीं मिलता। उनका जीवन और संघर्ष मुख्यतः मेवाड़, चित्तौड़, कुंभलगढ़, हल्दीघाटी और अरावली क्षेत्र से जुड़ा रहा।
इसी कारण इतिहासकारों का एक वर्ग यह सवाल उठा रहा है कि यदि किसी सार्वजनिक स्थल का नाम स्थानीय इतिहास से जुड़े व्यक्ति के नाम पर रखा गया था, तो उसके परिवर्तन का आधार क्या होना चाहिए।
हाल के वर्षों में उत्तर प्रदेश सहित देश के अनेक शहरों, रेलवे स्टेशनों और सार्वजनिक स्थलों के नाम बदले गए हैं। इनमें कई ऐसे नाम भी शामिल रहे हैं जो मुस्लिम शासकों, सूफी संतों या स्थानीय मुस्लिम ऐतिहासिक व्यक्तित्वों से जुड़े थे।
इतिहास और विरासत संरक्षण से जुड़े अनेक विशेषज्ञों का मानना है कि किसी स्थान का नाम केवल प्रशासनिक पहचान नहीं होता, बल्कि वह स्थानीय इतिहास और सामूहिक स्मृति का भी हिस्सा होता है। उनके अनुसार यदि ऐतिहासिक स्थानीय नाम लगातार बदले जाते हैं, तो समय के साथ नई पीढ़ियों का अपने क्षेत्र के बहुस्तरीय इतिहास और विभिन्न समुदायों के योगदान से परिचय कम हो सकता है। दूसरी ओर, नाम परिवर्तन के समर्थकों का कहना है कि यह सांस्कृतिक पुनर्स्मरण और राष्ट्रीय नायकों को सम्मान देने की प्रक्रिया है।
फिलहाल दाऊद खां रेलवे स्टेशन का नाम बदलने का प्रस्ताव रेल मंत्रालय के विचाराधीन है। यदि इस पर आगे बढ़ने का निर्णय होता है, तो निर्धारित प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रिया पूरी की जाएगी।
दाऊद खां रेलवे स्टेशन का विवाद केवल एक रेलवे स्टेशन के नाम तक सीमित नहीं है। इसने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि भारत जैसे बहुसांस्कृतिक देश में स्थानीय इतिहास, साझा विरासत और वर्तमान राजनीतिक प्राथमिकताओं के बीच संतुलन किस प्रकार स्थापित किया जाए।


