केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का यह बयान कि हिन्दू महासभा के दिवंगत पूर्व अध्यक्ष विनायक दामोदर सावरकर ने महात्मा गाँधी के कहने पर अंग्रेजों से माफ़ी मांगी थी, भाजपा के लिए गले की फांस बनता नजर आ रहा है।
जहाँ कांग्रेसी इस बयान को राजनाथ सिंह की कपोल – कल्पना बता रहे हैं, वहीं यह भी कहने से नहीं चूक रहे हैं कि आखिरकार भाजपा ने मान ही लिया कि सावरकर ‘वीर’ नहीं थे और अंग्रेजों से माफ़ी मांगकर जेल से बाहर आये थे।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद राजबब्बर ने भाजपा को झूठी पार्टी करार करते हुए कहा कि भाजपाइयों को इतिहास को अपने हिसाब से तोड़ने-मरोड़ने का शौक है और ऐसा करते में उन्हें देश-काल का भान नहीं रहता। बब्बर ने कहा कि सावरकर ने अंग्रेजों को पहला माफीनामा 1911 में कालापानी की सजा मिलने के कुछ ही महीने बाद अगस्त में लिखा था, जबकि महात्मा गाँधी दक्षिण अफ्रीका से भारत 1915 में वापस आये थे। ऐसे में कैसे संभव है कि सावरकर ने महात्मा गाँधी के कहने पर माफ़ी मांगी थी। बेहतर होता कि राजनाथ अपनी बात ज्यादा स्पष्टता से और तथ्यों व सबूतों के आधार पर रखते।
बब्बर ने कहा कि सावरकर ने जेल से छूटने के लिए अंग्रेजी सरकार के पास बार-बार माफीनामा भिजवाया, तो इसे स्वीकार करने में भाजपा को कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। यह सच है कि इस देश की संस्कृति, इतिहास और भविष्य के लिए आजादी की लड़ाई को लेकर उस दौर के हर व्यक्ति की अपनी एक समझ थी जिस पर आधारित उसकी ख़ास रणनीति थी।

बब्बर ने कहा कि यह रणनीति अगर भगत सिंह को फांसी के फंदे की ओर ले गई तो इसी तरह सावरकर की रणनीति ने उनको अंग्रेजी सरकार के पास माफीनामा भिजवाने के लिए प्रेरित किया। इसमें हमें भगत सिंह या सावरकर से सहमत होना आवश्यक नहीं है क्योंकि यह उनकी अपनी रणनीति थी।
कांग्रेस के पूर्व शहर अध्यक्ष हाजी जमीलउद्दीन का कहना था कि यह स्थिति तब उत्पन्न होती है जब हम एक ख़ास दौर के इतिहास को उसके मूल रूप में समझने और सम्बंधित व्यक्ति का सटीक मूल्यांकन करते हुए उनके गुणों – अवगुणों से सही सबक लेके की बजाय उन महापुरुषों को आपस में लड़ाना शुरू कर देते हैं। हाजी जमील का कहना था कि अब तक भाजपा यह मानने को ही तैयार नहीं थी कि सावरकर ने अंग्रेजों से माफ़ी मांगी थी। सोशल मीडिया के जमाने में जब वो माफीनामे सामने आने लगे तो अब सावरकर से माफ़ी मनवाने के लिए महात्मा गाँधी पर दोषारोपण किया जा रहा है, जबकि उस समय के तथ्यों को देखा जाए तो गाँधी और सावरकर के बीच कालापानी की सजा के दौरान कोई पत्राचार होने के कोई सबूत मौजूद नहीं हैं और गाँधी के दक्षिण अफ्रीका से वापस आने तक सावरकर अंग्रेजों को 3 माफीनामे लिख चुके थे।
हिन्दुस्तानी बिरादरी के उपाध्यक्ष विशाल शर्मा ने इस विषय पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यह सब विषय अब पुराने पड़ चुके हैं और बिना वजह इनको घसीटते रहने की जगह अगर मौजूदा राजनीतिज्ञों के चरित्र का विश्लेषण किया जाए तो बेहतर होगा। वर्तमान में देश की जनता महंगाई, बेरोजगारी एवं भ्रष्टाचार से दुखी है। सावरकर ने माफीनामा खुद लिखा या महात्मा गाँधी के कहने से, किसी रणनीति के तहत लिखा या कालापानी की सख्त सजा से घबराकर लिखा, इसपर बहस करने से देश का विकास नहीं होगा। विकास होगा आज की समस्याओं पर बात करने से, जिससे मौजूदा राजनीतिज्ञ हमेशा दूर भागते दिखते हैं। अब समय आ गया है कि सभी राजनेता आने वाले दस सालों के लिए विकास का रोडमैप तैयार करके जनता के सामने रखें ताकि एक निष्पक्ष आकलन हो सके कि कौन विकास की बात कर रहा है और कौन विनाश की।

