आरटीआई के तहत सामने आए जवाब में आगरा विकास प्राधिकरण ने स्वीकार किया है कि उसके पास पिछले पांच वर्षों में बिना कम्प्लीशन सर्टिफिकेट बिजली कनेक्शन प्राप्त करने वाले भवनों का कोई रिकॉर्ड नहीं है। यह खुलासा ऐसे समय में हुआ है जब सुप्रीम कोर्ट ने 2024 के ऐतिहासिक फैसले में बिजली, पानी और अन्य सेवाएं केवल वैध कम्प्लीशन या ऑक्यूपेशन सर्टिफिकेट के बाद ही उपलब्ध कराने के निर्देश दिए थे। रिपोर्ट में आरटीआई आवेदक डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य की प्रतिक्रिया भी शामिल है।


आगरा विकास प्राधिकरण (एडीए) की कार्यप्रणाली पर सूचना का अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त एक जवाब ने शहर में भवन निर्माण नियमों के पालन और प्राधिकरण की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एडीए ने अपने जवाब में स्वीकार किया है कि उसके पास पिछले पांच वर्षों में बने ऐसे भवनों की ऐसी कोई सूची नहीं है, जिन्होंने कम्प्लीशन सर्टिफिकेट (Completion Certificate) प्राप्त किए बिना बिजली कनेक्शन हासिल किया। यह स्वीकारोक्ति ऐसे समय में सामने आई है, जब 17 दिसंबर 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने राजेन्द्र कुमार बरजाट्या बनाम उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद एवं अन्य मामले में देशभर के विकास प्राधिकरणों और स्थानीय निकायों के लिए भवन निर्माण नियमों के अनुपालन को लेकर सख्त दिशानिर्देश जारी किए थे।

आरटीआई आवेदन संख्या ARDPA/R/2026/60219 के जवाब में एडीए के प्रवर्तन अनुभाग ने स्पष्ट रूप से कहा है कि पिछले पांच वर्षों में जिन निर्माणों ने कम्प्लीशन सर्टिफिकेट लिए बिना बिजली कनेक्शन प्राप्त किया, उससे संबंधित कोई सूची नहीं बनाई गई है।

दरअसल, आरटीआई में पूछा गया था कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुरूप पिछले पांच वर्षों में कितनी दुकानों, मॉल, बहुमंजिला इमारतों, अपार्टमेंट और अन्य भवनों का निर्माण पूर्ण होने के बावजूद कम्प्लीशन सर्टिफिकेट जारी नहीं हुआ, फिर भी उन्हें बिजली कनेक्शन मिल गया। साथ ही ऐसे भवनों की सूची और उनके विरुद्ध की गई कार्रवाई का विवरण भी मांगा गया था। इसके जवाब में एडीए ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि उसके पास ऐसी कोई सूची उपलब्ध नहीं है।

हालांकि इस संबंध में पूछे जाने पर आगरा विकास प्राधिकरण की उपाध्यक्ष एम. अरुणमोझी, आईएएस ने स्पष्ट किया कि प्राधिकरण के पास ऐसे निर्माणों से संबंधित अभिलेख उपलब्ध हैं, लेकिन वे विभिन्न वर्षों और मामलों के अनुसार अलग-अलग संधारित किए जाते हैं। उन्होंने कहा कि पिछले पांच वर्षों की सभी सूचनाओं को संकलित कर एक समेकित सूची तैयार करना आरटीआई आवेदन के निस्तारण की समय-सीमा के भीतर संभव नहीं था। इसी कारण आवेदक को मांगी गई सूचना उपलब्ध नहीं कराई जा सकी।

हालांकि, सूचना के अधिकार अधिनियम की दृष्टि से यह मामला एक अलग प्रश्न भी उठाता है। यदि विकास प्राधिकरण के पास संबंधित अभिलेख अलग-अलग उपलब्ध हैं, तो क्या सार्वजनिक हित से जुड़े ऐसे महत्वपूर्ण विषयों पर समेकित डिजिटल रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होना चाहिए? शहरी नियोजन विशेषज्ञों का मानना है कि भवनों के कम्प्लीशन सर्टिफिकेट, ऑक्यूपेशन सर्टिफिकेट तथा उनसे जुड़े बिजली, पानी एवं सीवर कनेक्शनों का एकीकृत डेटाबेस होने से न केवल पारदर्शिता बढ़ेगी, बल्कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के प्रभावी अनुपालन की निगरानी भी आसान होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक निर्णय में स्पष्ट निर्देश दिए थे कि किसी भी भवन को कम्प्लीशन अथवा ऑक्यूपेशन सर्टिफिकेट (CC/OC) जारी होने से पहले बिजली, पानी और सीवर जैसी मूलभूत सुविधाओं का कनेक्शन नहीं दिया जाना चाहिए। न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया था कि विकास प्राधिकरणों और स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी होगी कि वे भवनों का भौतिक निरीक्षण करें, निर्माण स्वीकृत मानचित्र के अनुरूप होने पर ही कम्प्लीशन सर्टिफिकेट जारी करें तथा प्रत्येक निरीक्षण का रिकॉर्ड सुरक्षित रखें।

सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा था कि यदि बिना वैध कम्प्लीशन सर्टिफिकेट के किसी भवन को आवश्यक सेवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं या नियमों का उल्लंघन होता है, तो संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाएगी। राज्य सरकारों को इन निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने के लिए परिपत्र जारी करने तथा उल्लंघन की स्थिति में विभागीय कार्रवाई करने के निर्देश भी दिए गए थे। एडीए का कहना है कि संबंधित अभिलेख उपलब्ध हैं, लेकिन समेकित रूप में नहीं हैं। ऐसे में यह मामला सीधे तौर पर न्यायालय के आदेशों के उल्लंघन का निष्कर्ष नहीं निकालता, पर यह प्रश्न अवश्य उठाता है कि क्या प्राधिकरण की रिकॉर्ड प्रबंधन प्रणाली सर्वोच्च न्यायालय की अपेक्षित पारदर्शिता और निगरानी व्यवस्था के अनुरूप है।

ऐसे में एडीए का यह कहना कि उसके पास पिछले पाँच वर में बिना कम्प्लीशन सर्टिफिकेट बिजली कनेक्शन प्राप्त करने वाले भवनों की कोई सूची ही नहीं है, सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित निगरानी और अभिलेख संधारण (Record Keeping) व्यवस्था के प्रभावी क्रियान्वयन पर सवाल खड़े करता है। हालांकि, आरटीआई का यह उत्तर अपने आप में यह सिद्ध नहीं करता कि एडीए ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन किया है, लेकिन यह अवश्य दर्शाता है कि प्राधिकरण ऐसे मामलों का कोई अभिलेख उपलब्ध नहीं करा सका, जबकि न्यायालय ने निगरानी और अनुपालन पर विशेष बल दिया था।

भवन निर्माण विशेषज्ञों के अनुसार कम्प्लीशन सर्टिफिकेट यह प्रमाणित करता है कि भवन स्वीकृत मानचित्र, भवन उपविधियों तथा सुरक्षा मानकों के अनुरूप बनाया गया है। इसके बिना भवन का उपयोग शुरू होना न केवल नियमों का उल्लंघन माना जाता है, बल्कि भविष्य में सुरक्षा संबंधी जोखिम भी पैदा कर सकता है।

एडीए के इस जवाब ने यह बहस भी तेज कर दी है कि क्या शहर में बिना वैधानिक स्वीकृतियों के भवनों का उपयोग वर्षों से होता रहा और नियामक संस्था ने उसकी कोई व्यवस्थित निगरानी ही नहीं की। यदि रिकॉर्ड तैयार नहीं किया गया, तो यह प्रशासनिक लापरवाही का विषय हो सकता है, और यदि रिकॉर्ड होने के बावजूद उपलब्ध नहीं कराया गया, तो पारदर्शिता पर भी प्रश्न उठते हैं।

आरटीआई आवेदक, कालीबाड़ी निवासी पर्यावरण एवं सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य ने कहा, “आगरा विकास प्राधिकरण का जवाब यह साबित करता है कि या तो प्राधिकरण के पास अपने ही नियमों के पालन का कोई रिकॉर्ड नहीं है, या फिर जानबूझकर रिकॉर्ड नहीं रखा गया। दोनों ही स्थितियां बेहद गंभीर हैं। यदि कम्प्लीशन सर्टिफिकेट के बिना बिजली कनेक्शन दिए जा रहे हैं और प्राधिकरण उसके आंकड़े तक नहीं रखता, तो यह पूरे भवन नियंत्रण तंत्र की विफलता है। ऐसे मामलों की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए।”

डॉ. भट्टाचार्य ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद यदि विकास प्राधिकरण अपने क्षेत्र में कम्प्लीशन सर्टिफिकेट, निरीक्षण और बिजली कनेक्शनों से जुड़े अभिलेख व्यवस्थित रूप से सूचीबद्ध नहीं रख पा रहा है, तो इससे शहरी नियोजन व्यवस्था की प्रभावशीलता पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर आगरा में कितने ऐसे भवन हैं, जो बिना कम्प्लीशन सर्टिफिकेट के संचालित हो रहे हैं और उन्हें पिछले पाँच वर्ष में बिजली जैसी मूलभूत सुविधा मिल चुकी है? यदि एडीए के पास इसका उत्तर उपलब्ध नहीं है, तो यह केवल सूचना के अभाव का मामला नहीं, बल्कि शहरी नियोजन, भवन सुरक्षा और नियामकीय जवाबदेही से जुड़ा एक गंभीर सार्वजनिक हित का प्रश्न बन जाता है। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि राज्य सरकार को एडीए की रिकॉर्ड प्रबंधन प्रणाली, सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुपालन और बिना कम्प्लीशन सर्टिफिकेट संचालित भवनों की स्थिति की स्वतंत्र समीक्षा करानी चाहिए।

(नोट: यह रिपोर्ट आरटीआई के आधिकारिक उत्तर पर आधारित है। रिपोर्ट में उठाए गए प्रश्न सार्वजनिक हित में उपलब्ध दस्तावेज़ से उत्पन्न तथ्यों और उससे निकलने वाले प्रशासनिक प्रश्नों पर आधारित हैं।)

Vishal Sharma
Vishal Sharma

Vishal Sharma is an experienced Indian journalist, cyber security consultant, social activist, and poet writing under the pen name Surur Akbarabadi. With over two decades in journalism, he has worked across print, digital, and TV media, including notable roles at The Indian Express, The Pioneer, Indo-American Times, and Business Standard. He is currently the editor of Agra24.in, a bilingual news portal focused on Agra, which he co-founded to provide in-depth analysis and balanced reporting. Based in Agra and Lucknow, Vishal balances his professional commitments with family life. Academically, he has studied Life Sciences, Law, and Business Management. His journalism covers current affairs, business, and social issues, with a focus on factual reporting and avoiding controversial topics that could harm social harmony. He actively promotes communal harmony through his role as Vice-Chairman of Hindustani Biradari, an organization founded to emphasize unity beyond religion and caste. He is also Secretary of the Agra Tourist Welfare Chamber and was also a member of Agra’s Heritage and History Conservation Committee, working to preserve the city’s cultural heritage. Professionally, Vishal brings his cyber security expertise to his media work, enhancing the technical and editorial quality of his news platforms. His interests include photography and travel, particularly exploring India’s diverse landscapes and cultural heritage sites. His contributions reflect a steady commitment to journalism, cultural preservation, and social cohesion without excessive embellishment.

By Vishal Sharma

Vishal Sharma is an experienced Indian journalist, cyber security consultant, social activist, and poet writing under the pen name Surur Akbarabadi. With over two decades in journalism, he has worked across print, digital, and TV media, including notable roles at The Indian Express, The Pioneer, Indo-American Times, and Business Standard. He is currently the editor of Agra24.in, a bilingual news portal focused on Agra, which he co-founded to provide in-depth analysis and balanced reporting. Based in Agra and Lucknow, Vishal balances his professional commitments with family life. Academically, he has studied Life Sciences, Law, and Business Management. His journalism covers current affairs, business, and social issues, with a focus on factual reporting and avoiding controversial topics that could harm social harmony. He actively promotes communal harmony through his role as Vice-Chairman of Hindustani Biradari, an organization founded to emphasize unity beyond religion and caste. He is also Secretary of the Agra Tourist Welfare Chamber and was also a member of Agra’s Heritage and History Conservation Committee, working to preserve the city’s cultural heritage. Professionally, Vishal brings his cyber security expertise to his media work, enhancing the technical and editorial quality of his news platforms. His interests include photography and travel, particularly exploring India’s diverse landscapes and cultural heritage sites. His contributions reflect a steady commitment to journalism, cultural preservation, and social cohesion without excessive embellishment.

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