
आगरा में वर्ष 2014 के एक जघन्य हत्या कांड में करीब साढ़े ग्यारह साल बाद सजा का ऐलान होना, न केवल पीड़ित परिवार के लिए लंबे इंतजार का अंत है, बल्कि भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में व्याप्त देरी की एक गंभीर तस्वीर भी पेश करता है। थाना हरीपर्वत क्षेत्र के आईएसबीटी इलाके में 31 अगस्त 2014 को सूरज की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। यह मामला अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत दर्ज हुआ था, लेकिन इसका अंतिम न्यायिक निष्कर्ष जनवरी 2026 में जाकर सामने आया।
घटना के अनुसार, वादी दयाल जाटव ने थाना हरीपर्वत में शिकायत दर्ज कराई थी कि यूसुफ उर्फ बैंगन समेत सात आरोपियों ने एकराय होकर लाठी-डंडों, सरिया और तमंचों से हमला किया। इस हमले में सूरज की मौके पर ही गोली मारकर हत्या कर दी गई, जबकि मनोज, जगदीश और सतीश गंभीर रूप से घायल हो गए। पुलिस ने तत्काल कार्रवाई करते हुए हत्या, हत्या के प्रयास, बलवा, आर्म्स एक्ट और एससी/एसटी एक्ट की धाराओं में मुकदमा दर्ज किया।
प्रारंभिक जांच अपेक्षाकृत तेज रही। पुलिस ने सितंबर 2014 में अधिकांश आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया और यूसुफ उर्फ बैंगन के कब्जे से .315 बोर का तमंचा और जिंदा कारतूस भी बरामद किया गया। अक्टूबर 2014 और फरवरी 2015 तक सभी आरोपियों के खिलाफ आरोप पत्र न्यायालय में दाखिल कर दिए गए। इसके बावजूद, मामला वर्षों तक न्यायालय में लंबित रहा।
इस देरी के पीछे कई कारण सामने आए। सबसे बड़ा कारण गवाहों की पेशी में बार-बार होने वाला विलंब रहा। कई गवाह समय पर अदालत में उपस्थित नहीं हो सके, तो कई बार तारीखें अभियोजन और बचाव पक्ष की ओर से स्थगित होती रहीं। इसके अलावा, कुछ आरोपियों द्वारा भी कार्यवाही को लंबा खींचने के प्रयास भी किए गए। एक आरोपी कालू की विचारण के दौरान मृत्यु हो गई, और एक नाबालिग निकला जिससे मुकदमे की प्रक्रिया और जटिल हो गई।
न्यायिक देरी का एक अन्य कारण अदालतों पर बढ़ता मुकदमों का बोझ भी माना जा रहा है। एससी/एसटी एक्ट से जुड़े मामलों में विशेष अदालतें होने के बावजूद, सीमित न्यायिक संसाधनों के चलते मामलों का त्वरित निस्तारण नहीं हो पाता। इस प्रकरण में भी कई वर्षों तक साक्ष्य और जिरह की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी।
हालांकि, हाल के वर्षों में पुलिस और अभियोजन स्तर पर “ऑपरेशन कन्विक्शन” जैसे अभियानों के तहत पुराने लंबित मामलों की प्रभावी पैरवी शुरू की गई। आगरा पुलिस कमिश्नरेट के मॉनिटरिंग सेल, कोर्ट पैरोकार और अभियोजन अधिकारियों ने इस मामले में लगातार निगरानी रखी और गवाहों की सुसंगत गवाही अदालत के समक्ष प्रस्तुत कराई ।
अंततः 27 जनवरी 2026 को एडीजे-02 / विशेष न्यायाधीश (एससी/एसटी एक्ट) शिव कुमार की अदालत ने चार आरोपियों—यूसुफ उर्फ बैंगन, वसीम, रवि उर्फ हकला और चांद—को दोषी ठहराते हुए आजीवन सश्रम कारावास की सजा सुनाई। इसके साथ ही अलग-अलग आरोपियों पर कुल मिलाकर हजारों रुपये का अर्थदंड भी लगाया गया। एक आरोपी कालू की पहले ही मृत्यु हो चुकी थी, जबकि दो अन्य आरोपियों का मामला अभी न्यायालय में विचाराधीन है ।
यह फैसला जहां पीड़ित परिवार को वर्षों बाद न्याय का अहसास कराता है, वहीं यह सवाल भी खड़ा करता है कि यदि सजा 11 साल पहले मिल जाती, तो न्याय व्यवस्था पर लोगों का भरोसा और मजबूत होता। विशेषज्ञों का मानना है कि न्याय में देरी, न्याय से वंचित करने के समान है, खासकर तब जब मामला हत्या और सामाजिक उत्पीड़न से जुड़ा हो।
यह प्रकरण आगरा ही नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश के लिए एक चेतावनी है कि गंभीर आपराधिक मामलों में समयबद्ध सुनवाई और सजा सुनिश्चित करने के लिए न्यायिक और प्रशासनिक सुधारों की सख्त जरूरत है। साढ़े एक दशक बाद आया यह फैसला कानून-व्यवस्था के लिए अहम जरूर है, लेकिन साथ ही यह न्यायिक देरी के दर्दनाक सच को भी उजागर करता है।


