आगरा में कोरोना की पीक गुजरे कई महीने बीत चुके हैं। अप्रैल और मई के महीनों में कोरोना महामारी आगरा पर क़यामत की तरह बरसी थी और दसियों हज़ार आगरावासियों को संक्रमित किया था। सैंकड़ों लोगों की जान गई, हालांकि आधिकारिक आंकड़े काफी कम संख्या बताते हैं। सिर्फ ताजगंज ही नहीं, बल्कि आगरा के सभी शमशानों पर घंटों इन्तजार करने के बाद शवदाह हो पा रहा था।
इस भयावह मंजर को बीते लगभग 6 महीने हो चुके हैं लेकिन ताजगंज शमशान घाट के कर्मचारियों के दिल आज भी उस समय को याद करके सिहर उठते हैं। ताजगंज के विद्युत् शवदाहगृह के एक कर्मचारी के अनुसार उस समय वहाँ दर्जनों ऐसे शव आये थे जिनके साथ कोई परिवारीजन नहीं आये थे। ऐसे शवों की अंतिम क्रिया शवदाहगृह के कर्मचारियों ने ही की थी और उनकी अस्थियाँ संभाल कर रख दी थीं ताकि मृतकों के परिवारीजन बाद में आकर गंगा में विसर्जन हेतु अस्थियाँ ले जा सकें।
लेकिन छह माह गुजरने के बाद भी इस समय 53 कोरोना मृतकों की अस्थियां विसर्जन हेतु परिवारीजनों का इन्तजार कर रही हैं। शवदाह गृह के कर्मचारी ने बताया कि कई बार इन अस्थियों के बाबत परिवारीजनों को फोन भी किये गए लेकिन उन्होंने कोई न कोई बहाना बनाकर टाल दिया।
शवदाहगृह प्रभारी संजीव गुप्ता के अनुसार कोरोना महामारी की दूसरी लहर में अप्रैल से जून तक 1349 शवों का अंतिम संस्कार किया गया था। इनमें कोरोना की वजह से कई शवों के साथ उनके परिवारीजन नहीं आये थे तो शवदाहगृह कर्मचारियों ने ही PPE किट पहन कर अंतिम संस्कार किया था। जैसे जैसे संक्रमण की दर कम हुई, लोग अपनों की अस्थियाँ ले गए, लेकिन 53 अस्थियाँ अभी भी अपनों की बाट जोह रही हैं। श्राद्ध पक्ष में तो इन मृतकों के परिजनों को कई बार फोन भी किया गया, लेकिन कोई नहीं आया।
ताजगंज शमशान गृह का प्रबंध संभालने वाली श्री क्षेत्र बजाजा कमेटी के अध्यक्ष अशोक गोयल का कहना था कि अगर कोई अस्थियाँ लेने नहीं आता है तो तीन वर्षों के बाद इन अस्थियों का विसर्जन श्री क्षेत्र बजाजा कमेटी द्वारा गंगा में पूरे विधि विधान के साथ करा दिया जाता है।
बजाजा कमेटी के पूर्व अध्यक्ष सुनील विकल ने बताया कि अस्थियों को शवदाह गृह पर अस्थियों को सुरक्षित रूप से रखा जाता है। वर्ष 1998 से श्री क्षेत्र बजाजा कमेटी द्वारा यह प्रकल्प शुरू किया गया था और पिछले 23 वर्षों में लगभग 12 हज़ार मृतकों की अस्थियाँ कमेटी द्वारा गंगा में विसर्जित की जा चुकी हैं।
इस सन्दर्भ में महंत विनय सारस्वत ने बताया कि सनातन धर्म में शव की अंतिम क्रिया तभी पूर्ण मानी जाती है जब दाह संस्कार के बाद अस्थियों का विसर्जन हो जाए। खास तौर पर अपनों के हाथों से अस्थियों का विसर्जन होने से आत्मा को शांति मिलती है।

